लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विकास नगर में लगी भीषण आग ने न केवल सैकड़ों घरों को राख कर दिया, बल्कि कई परिवारों के अरमानों को भी जलाकर खाक कर दिया है। सबसे हृदयविदारक स्थिति एक ऐसे परिवार की है, जहां अगले ही दिन बेटे की बारात निकलनी थी। जिस घर में मंगल गीतों की गूंज होनी चाहिए थी, वहां अब सिर्फ सिसकियां और मलबे का ढेर बचा है। आलम यह है कि बेटे ने मजबूरी में सादगी से निकाह तो कर लिया, लेकिन वह अपनी पत्नी (नई बहू) को विदा कराकर घर लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा, क्योंकि सिर छिपाने को छत तक नसीब नहीं है।
“गहने, कपड़े और नकदी… सब राख”: रेशमा का छलका दर्द
विकास नगर सेक्टर-11 की झुग्गी बस्ती में रहने वाली रेशमा के लिए यह आग किसी कयामत से कम नहीं थी। रेशमा ने बताया कि शाम को घर में शादी की तैयारियां चल रही थीं, तभी अचानक आग की लपटों ने सब कुछ घेर लिया। उन्होंने पाई-पाई जोड़कर बहू के लिए जो गहने और कपड़े बनवाए थे, वे सब चंद मिनटों में जल गए। शादी के लिए लिया गया उधार का पैसा भी राख हो गया। रेशमा का बेटा फिलहाल अपनी पत्नी के साथ ससुराल में रहने को मजबूर है क्योंकि अपनी ही बस्ती में अब सिर्फ धुआं और राख बची है।
9 महीने की गर्भवती पत्नी को बचाया, पर नहीं बचा पाए आशियाना
इसी बस्ती के निवासी रंजीत की कहानी भी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। रंजीत की पत्नी नौ महीने की गर्भवती है। जैसे ही बस्ती में सिलेंडर फटने के धमाके शुरू हुए, रंजीत अपनी जान पर खेलकर पत्नी को सुरक्षित स्थान पर ले गए। लेकिन जब तक वह वापस लौटे, उनका सालों का बना-बनाया संसार उजड़ चुका था। गुल्लक में जमा किए थोड़े-बहुत पैसे और आने वाले बच्चे के लिए रखे सामान का अब नामोनिशान नहीं है।
दो मासूम जिंदगियां निगल गई आग, पूरी रात सुलगती रही बस्ती
यह आग सिर्फ संपत्ति ही नहीं, बल्कि दो नन्ही जानें भी ले गई। हादसे में दो साल की दो मासूम बच्चियों की जलकर मौत हो गई, जिससे पूरी बस्ती में सन्नाटा पसरा हुआ है। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, आग शाम करीब 5:30 बजे लगी और देखते ही देखते तिरपाल व फूस की झोपड़ियों को अपनी चपेट में ले लिया। सिलेंडरों के फटने से धमाके इतने तेज थे कि दमकल की 22 गाड़ियों को आग पर काबू पाने में रात के 10 बज गए।
चार दशक की मेहनत मिट्टी में मिली, पहचान पत्र तक जले
पिछले 40 वर्षों से यहां बसे परिवारों के पास अब तन पर बचे कपड़ों के अलावा कुछ नहीं है। राशन, बर्तन और पहचान से जुड़े जरूरी दस्तावेज (आधार, वोटर आईडी) तक जल चुके हैं। विकास नगर की यह झुग्गी बस्ती अब एक वीरान मैदान में तब्दील हो गई है, जहां लोग राख के ढेर में अपनी यादें और बचे-खुचे सामान की तलाश कर रहे हैं। प्रशासन के सामने अब इन बेघर हुए परिवारों के पुनर्वास की बड़ी चुनौती है।
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