
नई दिल्ली। वैश्विक तनाव और ईरान से जुड़ी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया बुधवार को गिरकर अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 92.62 पर पहुंच गया। यह गिरावट निवेशकों की बढ़ती चिंता और विदेशी बाजारों में अस्थिरता का सीधा परिणाम मानी जा रही है।
ईरान संकट से बढ़ी वैश्विक चिंता
मध्य-पूर्व में ईरान से जुड़ी हालिया घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हलचल मचा दी है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और आपूर्ति को लेकर बढ़ती आशंकाओं ने निवेशकों का रुझान सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर मोड़ दिया है। इसका सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी डॉलर को मिला, जबकि उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया।
रुपये पर क्यों बढ़ा दबाव
विशेषज्ञों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों की निकासी और आयात बिल बढ़ने की आशंका के चलते रुपये पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। खासकर भारत जैसे देश, जो तेल आयात पर काफी निर्भर हैं, वहां इस तरह के संकट का असर जल्दी देखने को मिलता है। डॉलर की मजबूती के सामने रुपया कमजोर पड़ता गया और अंततः 92.62 के स्तर तक गिर गया।
शेयर बाजार और निवेशकों पर असर
रुपये में गिरावट का असर घरेलू शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ने से बाजार में उतार-चढ़ाव तेज हो गया। साथ ही, आयात महंगा होने से महंगाई बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है, जिससे आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
आगे क्या है संकेत
आर्थिक जानकारों का मानना है कि जब तक ईरान से जुड़ा तनाव कम नहीं होता और वैश्विक बाजार स्थिर नहीं होते, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक की संभावित दखल और सरकारी कदम इस गिरावट को कुछ हद तक संभाल सकते हैं।
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