
टॉयलेट पेपर और टिशू पेपर आज रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। घर से लेकर ऑफिस और सफर तक इनका इस्तेमाल आम है। लेकिन क्या जिस पेपर को हम शरीर की सफाई और हाइजीन के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसमें मौजूद कुछ रसायन सेहत के लिए चिंता का कारण बन सकते हैं? वैज्ञानिक अध्ययनों में टॉयलेट पेपर और दूसरे पेपर प्रोडक्ट्स में कुछ ऐसे रसायनों की मौजूदगी पर ध्यान दिया गया है, जो त्वचा में जलन और एलर्जी जैसी समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर टॉयलेट पेपर नुकसानदायक है या इसके इस्तेमाल से हर व्यक्ति को बीमारी होगी। किसी रसायन की मौजूदगी और उससे वास्तविक स्वास्थ्य जोखिम के बीच अंतर होता है। इसलिए टॉयलेट पेपर में पाए जाने वाले संभावित केमिकल्स और उनसे जुड़े वैज्ञानिक प्रमाणों को समझना जरूरी है।
टॉयलेट पेपर में किन केमिकल्स को लेकर चिंता?
टॉयलेट पेपर तैयार करने के दौरान कागज को सफेद, मुलायम, मजबूत या खुशबूदार बनाने के लिए अलग-अलग प्रक्रियाओं और एडिटिव्स का इस्तेमाल किया जा सकता है। इनमें ब्लीचिंग एजेंट, डाई, खुशबू देने वाले पदार्थ और कुछ अन्य रसायन शामिल हो सकते हैं। कुछ शोधों में पेपर और हाइजीन प्रोडक्ट्स में फॉर्मेल्डिहाइड, प्रिजर्वेटिव्स, फ्रेगरेंस और अन्य रसायनों से होने वाली एलर्जिक या इरिटेंट प्रतिक्रियाओं की संभावना पर चर्चा की गई है।
विशेष रूप से संवेदनशील त्वचा वाले लोगों में खुशबू, कुछ प्रिजर्वेटिव्स और अन्य एलर्जेनिक पदार्थ संपर्क के बाद जलन या एलर्जी की समस्या पैदा कर सकते हैं। त्वचा संबंधी दिशानिर्देशों में भी फ्रेगरेंस और फॉर्मेल्डिहाइड जैसे सामान्य कॉन्टैक्ट एलर्जेंस से बचने की सलाह दी जाती है।
PFAS क्या है और टॉयलेट पेपर से इसका क्या संबंध है?
सबसे ज्यादा चर्चा PFAS यानी Per- and Polyfluoroalkyl Substances को लेकर होती है। यह हजारों सिंथेटिक रसायनों का एक बड़ा समूह है। इन्हें पानी, तेल, दाग और गर्मी के प्रति प्रतिरोधी गुणों के लिए अलग-अलग औद्योगिक और उपभोक्ता उत्पादों में इस्तेमाल किया गया है।
UNEP की PFAS जानकारी के मुताबिक, हालिया अध्ययनों में व्यक्तिगत स्वच्छता से जुड़े कुछ उत्पादों, जिनमें टॉयलेट पेपर भी शामिल है, में PFAS पाए जाने की जानकारी सामने आई है। UNEP के अनुसार PFAS लंबे समय तक पर्यावरण में बने रह सकते हैं और इनके कुछ प्रकारों को कैंसर, प्रजनन संबंधी नुकसान और इम्यून सिस्टम पर प्रभाव समेत गंभीर स्वास्थ्य चिंताओं से जोड़ा गया है।
PFAS को अक्सर ‘फॉरएवर केमिकल्स’ कहा जाता है, क्योंकि इनमें से कई रसायन पर्यावरण में बेहद लंबे समय तक बने रह सकते हैं। इनके व्यापक इस्तेमाल और टिकाऊ रासायनिक संरचना की वजह से वैज्ञानिक लंबे समय से इनके संभावित स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं।
क्या PFAS वाला टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करने से बीमारी हो जाएगी?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। किसी उत्पाद में किसी रसायन की मौजूदगी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि उसके इस्तेमाल से किसी व्यक्ति को निश्चित रूप से बीमारी होगी। स्वास्थ्य जोखिम इस बात पर भी निर्भर करता है कि रसायन की मात्रा कितनी है, शरीर के संपर्क में आने का तरीका क्या है और संपर्क कितनी अवधि तक होता है।
PFAS को लेकर उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य में मानव स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जरूर सामने आई है, लेकिन टॉयलेट पेपर के सामान्य इस्तेमाल से किसी व्यक्ति को होने वाले व्यक्तिगत स्वास्थ्य जोखिम को लेकर अभी और शोध की जरूरत है। इसलिए इसे सीधे यह कहना सही नहीं होगा कि टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करने से PFAS के कारण बीमारी होना तय है।
त्वचा में जलन और एलर्जी का खतरा भी समझें
टॉयलेट पेपर से जुड़ी चिंता सिर्फ PFAS तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक साहित्य में पेपर और खासकर नम टॉयलेट पेपर या वेट वाइप्स में मौजूद कुछ प्रिजर्वेटिव्स से एलर्जिक कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस के मामले भी दर्ज किए गए हैं। एक पुराने नियंत्रित अध्ययन में कुछ लोगों में नम टॉयलेट पेपर के प्रिजर्वेटिव्स से एलर्जी और रीसाइकिल्ड टॉयलेट पेपर के खुरदरे टेक्सचर से इरिटेशन की संभावना सामने आई थी।
एक अन्य मेडिकल केस रिपोर्ट में ब्लीच किए गए टॉयलेट पेपर के इस्तेमाल के बाद लंबे समय तक वल्वर इरिटेशन की समस्या का उल्लेख किया गया था। हालांकि, उस मामले में कारण के रूप में केवल टॉयलेट पेपर के किसी एक केमिकल को निश्चित रूप से जिम्मेदार साबित नहीं किया गया था।
खुशबू वाला टिशू हर किसी के लिए सही नहीं
खुशबूदार टॉयलेट पेपर और टिशू देखने में आकर्षक लग सकते हैं, लेकिन संवेदनशील त्वचा वाले लोगों के लिए फ्रेगरेंस एक संभावित इरिटेंट या एलर्जेन हो सकता है। रिसर्च में फ्रेगरेंस से जुड़े कई रसायनों को कॉन्टैक्ट एलर्जी और त्वचा की संवेदनशीलता से जोड़ा गया है।
इसलिए यदि किसी व्यक्ति को टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करने के बाद बार-बार खुजली, जलन, लालिमा या त्वचा में परेशानी महसूस होती है, तो समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे मामलों में बिना जरूरत अलग-अलग क्रीम या दवाएं लगाने के बजाय डॉक्टर या त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
टॉयलेट पेपर खरीदते समय किन बातों का रखें ध्यान?
टॉयलेट पेपर चुनते समय केवल उसकी कीमत, मोटाई या खुशबू पर ध्यान देने के बजाय उत्पाद की गुणवत्ता और अपनी त्वचा की संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखना चाहिए। संवेदनशील त्वचा वाले लोग जरूरत पड़ने पर बिना खुशबू वाले विकल्प चुन सकते हैं। बहुत अधिक रंग या परफ्यूम वाले उत्पादों से परेशानी होने पर उन्हें बदलकर देखा जा सकता है।
साथ ही, जरूरत से ज्यादा रगड़ने से भी त्वचा में इरिटेशन हो सकता है। इसलिए सफाई करते समय त्वचा पर अत्यधिक दबाव डालने से बचना जरूरी है।
रिसर्च का संदेश क्या है?
वैज्ञानिक अध्ययनों से इतना जरूर स्पष्ट है कि पेपर और पर्सनल हाइजीन प्रोडक्ट्स में मौजूद कुछ रसायनों को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत है। PFAS जैसे ‘फॉरएवर केमिकल्स’ की मौजूदगी, फ्रेगरेंस और कुछ प्रिजर्वेटिव्स से होने वाली एलर्जी तथा खुरदरे पेपर से होने वाली त्वचा की जलन अलग-अलग शोधों में सामने आई है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर टॉयलेट पेपर शरीर के लिए खतरनाक है। सबसे जरूरी बात यह है कि किसी खास उत्पाद में किसी रसायन की मौजूदगी, उसकी मात्रा और उससे वास्तविक मानव स्वास्थ्य जोखिम को अलग-अलग समझा जाए। यदि टॉयलेट पेपर या टिशू इस्तेमाल करने के बाद लगातार त्वचा में जलन, एलर्जी या असहजता हो रही है, तो उत्पाद बदलने के साथ चिकित्सकीय सलाह लेना समझदारी होगी।
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