नई दिल्ली। ईरानी युद्धपोत IRIS Dena के समुद्र में डूबने की घटना को लेकर वैश्विक स्तर पर नई बहस छिड़ गई है। इस मामले पर भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष General Ved Prakash Malik ने गंभीर चिंता जताते हुए इसे पश्चिम एशिया के संघर्ष के भारतीय महासागर तक फैलने का संकेत बताया है। उन्होंने कहा कि यह घटना सिर्फ एक सैन्य टकराव नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन की ओर भी इशारा करती है। पूर्व सेनाध्यक्ष ने इस संदर्भ में 1988 के ऐतिहासिक सैन्य अभियान Operation Cactus का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौर में अमेरिका क्षेत्रीय संकटों में भारत की भूमिका को प्राथमिकता देता था, लेकिन अब परिस्थितियां बदलती दिख रही हैं। पूर्व सेना प्रमुख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि IRIS Dena के डूबने की घटना इस बात का संकेत हो सकती है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का असर अब भारतीय महासागर क्षेत्र तक फैल सकता है। उनके अनुसार इस तरह की घटनाएं वैश्विक समुद्री सुरक्षा और सामरिक संतुलन पर भी असर डाल सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि रणनीतिक साझेदारी होने के बावजूद अब अमेरिका कई बार सैन्य कार्रवाई करते समय सहयोगी देशों से सलाह लेने को जरूरी नहीं समझता। यह बदलाव अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सैन्य रणनीति दोनों में नए संकेत देता है। पूर्व सेनाध्यक्ष ने 1988 में मालदीव में हुए Operation Cactus की घटना को याद करते हुए बताया कि उस समय मालदीव में सशस्त्र विद्रोहियों ने राजधानी माले पर कब्जा करने की कोशिश की थी। हालात इतने गंभीर हो गए थे कि तत्कालीन राष्ट्रपति Maumoon Abdul Gayoom को छिपने के लिए मजबूर होना पड़ा और उन्होंने भारत से तत्काल सैन्य मदद मांगी। मलिक के मुताबिक, उस समय भारत जब सैन्य कार्रवाई की योजना बना रहा था, तभी भारत के विदेश सचिव K. P. S. Menon को अमेरिका के राजदूत John Gunther Dean का फोन आया। उन्होंने भारत से मालदीव में चल रही स्थिति और संभावित सैन्य योजना की जानकारी मांगी थी। पूर्व सेनाध्यक्ष के अनुसार उस समय अमेरिका का स्पष्ट मानना था कि दक्षिण एशिया या हिंद महासागर क्षेत्र के किसी भी राजनीतिक संकट में भारत की भूमिका सबसे अहम है। अमेरिका ने जरूरत पड़ने पर मदद की पेशकश भी की थी, लेकिन भारत ने अपने दम पर कार्रवाई करने का फैसला लिया। उन्होंने बताया कि भारतीय सेना ने केवल 36 घंटे के भीतर ऑपरेशन कैक्टस को सफलतापूर्वक अंजाम दे दिया। उस समय अगर अमेरिकी जहाज मदद के लिए आते तो उन्हें मालदीव की राजधानी माले तक पहुंचने में 48 से 72 घंटे तक लग सकते थे। 3 नवंबर 1988 को करीब 80 हथियारबंद विद्रोहियों और भाड़े के सैनिकों ने माले के सरकारी भवनों, बंदरगाह और टीवी-रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री Rajiv Gandhi ने कैबिनेट बैठक के बाद तुरंत भारतीय सेना को कार्रवाई की अनुमति दी। भारतीय वायुसेना के Ilyushin Il-76 विमान से आगरा से पैराट्रूपर्स को माले भेजा गया और रात करीब 10 बजे भारतीय सैनिक वहां उतरे। कुछ ही घंटों में राजधानी माले को विद्रोहियों से मुक्त करा लिया गया और राष्ट्रपति गयूम को सुरक्षित निकाल लिया गया। 4 नवंबर की सुबह तक माले पूरी तरह भारतीय सैनिकों के नियंत्रण में आ चुका था। इसके बाद भारतीय नौसेना ने समुद्र में भाग रहे विद्रोहियों का पीछा किया और MV Progress Light नामक जहाज को रोककर आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया। पूर्व सेनाध्यक्ष का मानना है कि उस समय की स्थिति और आज की वैश्विक रणनीति में बड़ा अंतर दिखाई देता है। उनके अनुसार IRIS Dena की घटना यह संकेत देती है कि बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ी शक्तियां अब कई बार साझेदार देशों से परामर्श किए बिना भी सैन्य कार्रवाई कर रही हैं।
पश्चिम एशिया का तनाव हिंद महासागर तक पहुंचने का संकेत
ऑपरेशन कैक्टस की याद क्यों आई?
तब अमेरिका मानता था – क्षेत्रीय संकट में भारत की प्राथमिक भूमिका
36 घंटे में भारतीय सेना ने पलट दी स्थिति
नौसेना ने समुद्र में घेरकर पकड़े विद्रोही
IRIS Dena डूबने पर पूर्व सेनाध्यक्ष का बड़ा बयान: “अब बदल गया है अमेरिका का रवैया”, ऑपरेशन कैक्टस का दिया उदाहरण
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