पश्चिम एशिया में तनाव खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तल्खियों और सख्त बयानों के बीच अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump आखिर अगला कदम क्या उठाने वाले हैं। अमेरिकी सैन्य तैयारियों ने संकेत दे दिए हैं कि हालात सामान्य नहीं हैं, लेकिन अंतिम फैसला अभी व्हाइट हाउस के हाथ में है।
मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य जमावड़ा, बढ़ी हलचल
इराक युद्ध के बाद पहली बार पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ताकत इतनी बड़ी संख्या में सक्रिय दिख रही है। ईरान के आसपास दो एयरक्राफ्ट कैरियर, कई जंगी जहाज और सैकड़ों लड़ाकू विमान तैनात किए गए हैं। इस बढ़ी हुई सैन्य मौजूदगी ने पूरे क्षेत्र में युद्ध की आशंका को तेज कर दिया है।
हालांकि दूसरी ओर परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की प्रक्रिया भी जारी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह सैन्य दबाव कूटनीतिक समझौते के लिए रणनीति है या किसी बड़े सैन्य अभियान की प्रस्तावना?
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप के सामने फिलहाल तीन अलग-अलग विकल्प मौजूद हैं। इन विकल्पों पर बीते हफ्तों में गहन चर्चा हुई है और उनके संभावित जोखिम व नतीजों का आकलन किया गया है।
पहला विकल्प: डिप्लोमेसी से हल निकालने की कोशिश
राष्ट्रपति ट्रंप सैन्य कार्रवाई से फिलहाल दूरी बनाए रखते हुए कूटनीतिक दबाव की नीति अपना सकते हैं। रणनीति यह हो सकती है कि ईरान के तटों पर भारी अमेरिकी सैन्य मौजूदगी दिखाकर तेहरान को बातचीत की मेज पर झुकने के लिए मजबूर किया जाए।
व्हाइट हाउस के अधिकारियों का मानना है कि यदि बिना युद्ध के समझौता संभव हो तो वही बेहतर विकल्प होगा। अमेरिका की कोशिश है कि ईरान उसकी शर्तों के तहत किसी नए समझौते पर सहमत हो जाए।
सूत्रों के अनुसार, ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जेरेड कुशनर परोक्ष रूप से ईरानी अधिकारियों से संपर्क में हैं। ओमान के मध्यस्थों के जरिए प्रस्तावों का आदान-प्रदान किया जा रहा है। जिनेवा में संभावित उच्चस्तरीय वार्ता को निर्णायक माना जा रहा है। अगर वहां सकारात्मक संकेत मिलते हैं तो सैन्य टकराव टल सकता है।
दूसरा विकल्प: डील के लिए लिमिटेड स्ट्राइक
दूसरा रास्ता सीमित सैन्य कार्रवाई का हो सकता है। इस विकल्प के तहत अमेरिका ईरान के चुनिंदा सैन्य और परमाणु ठिकानों पर सीमित हमले कर सकता है, ताकि दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाई जा सकें।
संभावित लक्ष्यों में बैलिस्टिक मिसाइल साइट्स, परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी सुविधाएं और Islamic Revolutionary Guard Corps के ठिकाने शामिल हो सकते हैं।
इस रणनीति का उद्देश्य यह संदेश देना होगा कि अमेरिकी चेतावनियां केवल बयानबाजी नहीं हैं। हालांकि, इस तरह की कार्रवाई से क्षेत्रीय संघर्ष भड़कने और ईरान की जवाबी कार्रवाई का खतरा भी बना रहेगा।
तीसरा विकल्प: सत्ता परिवर्तन की ओर बड़ा कदम
सबसे आक्रामक विकल्प ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश हो सकती है। इस परिदृश्य में अमेरिकी सेना सीधे तेहरान की सत्ता संरचना को निशाना बना सकती है, जिसका अंतिम लक्ष्य ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के नेतृत्व वाली सरकार को हटाना हो सकता है।
इस तरह की कार्रवाई व्यापक और बहु-स्तरीय सैन्य अभियान का रूप ले सकती है, जिसमें एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल उत्पादन केंद्र, परमाणु ठिकाने और शीर्ष सैन्य नेतृत्व को एक साथ निशाना बनाया जाए।
हालांकि बड़ा सवाल यह है कि यदि मौजूदा सत्ता संरचना को हटा दिया जाता है तो उसके बाद ईरान में स्थिर शासन कैसे स्थापित होगा। यही इस विकल्प का सबसे बड़ा जोखिम भी माना जा रहा है।
क्या होगा ट्रंप का अगला कदम?
डिप्लोमेसी, सीमित हमला या फिर बड़ा सैन्य ऑपरेशन—तीनों विकल्पों के अपने फायदे और गंभीर जोखिम हैं। एक ओर परमाणु समझौते की संभावना है, तो दूसरी ओर मिडिल ईस्ट में बड़े युद्ध का खतरा भी मंडरा रहा है।
अब पूरी दुनिया की नजर वॉशिंगटन और तेहरान पर टिकी है। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि क्या तनाव बातचीत से सुलझेगा या पश्चिम एशिया एक नए संघर्ष की आग में धकेल दिया जाएगा।
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