यूपी में फिर दिखेगा ‘बुआ-बबुआ’ का जलवा? अखिलेश यादव ने 2027 से पहले मायावती को दिया ‘महा-गठबंधन’ का गुप्त संदेश!

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में क्या एक बार फिर ‘हाथी’ और ‘साइकिल’ साथ दौड़ते नजर आएंगे? यह सवाल इसलिए चर्चा में है क्योंकि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कुछ ऐसे संकेत दिए हैं, जिन्हें बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए ‘ओपन ऑफर’ माना जा रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश का यह दांव यूपी की राजनीति में बड़े उलटफेर की आहट दे रहा है।

लोहिया-आंबेडकर का जिक्र और ‘पुराने रिश्तों’ की दुहाई

हाल ही में पूर्व बसपा नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के सपा में शामिल होने के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि गठबंधन बनते हैं और टूट जाते हैं, लेकिन संघर्ष को मजबूत करने के लिए पुराने साथियों का साथ आना जरूरी है। उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि कभी डॉ. बी.आर. आंबेडकर और राम मनोहर लोहिया ने भी साथ मिलकर राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश की थी, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें समय नहीं दिया। अखिलेश का यह बयान सीधे तौर पर दलित-पिछड़ा (PDA) एकता की तरफ इशारा है, जिसे मायावती को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

मायावती का ‘सवर्ण वोट’ वाला दांव और अखिलेश की बेचैनी?

पिछले महीने अपने 70वें जन्मदिन पर मायावती ने साफ किया था कि बसपा अकेले चुनाव लड़ेगी। हालांकि, उन्होंने एक ‘कंडीशन’ भी रखी थी कि अगर कोई दल उन्हें ‘सवर्ण वोट’ ट्रांसफर कराने की गारंटी दे, तो वह गठबंधन पर विचार कर सकती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती का यह इशारा भाजपा की तरफ था। शायद इसी खतरे को भांपते हुए अखिलेश यादव अब ‘बड़े दिल’ की बात कर रहे हैं ताकि 2027 में सत्ता विरोधी वोटों का बिखराव न हो।

अस्तित्व की लड़ाई: 10 बनाम 15 साल का वनवास

सपा और बसपा दोनों के लिए 2027 का चुनाव करो या मरो जैसा है।

  • सपा: 2017 से सत्ता से दूर है, 2027 तक 10 साल का वनवास हो जाएगा।

  • बसपा: 2012 के बाद से वापसी नहीं कर पाई है, 15 साल सत्ता से बाहर रहना किसी भी पार्टी के वजूद के लिए बड़ा संकट है।

अखिलेश यादव जानते हैं कि अगर बसपा और भाजपा का किसी भी तरह का तालमेल होता है, तो ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का उनका गणित बिगड़ सकता है। इसीलिए उन्होंने अभी से रिश्तों की जमी हुई बर्फ पिघलाने की कोशिश शुरू कर दी है।

गेस्ट हाउस कांड से 2019 के गठबंधन तक का सफर

1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने मिलकर ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’ के नारे के साथ बीजेपी को रोका था। हालांकि, 1995 के ‘गेस्ट हाउस कांड’ ने दोनों दलों में गहरी खाई पैदा कर दी। 24 साल बाद 2019 में अखिलेश और मायावती फिर साथ आए, जिसका फायदा बसपा को मिला (0 से 10 सीटें)। अब देखना होगा कि क्या 2027 में ‘बुआ-भतीजा’ की जोड़ी फिर से यूपी की सड़कों पर पोस्टर में साथ नजर आएगी।

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