
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में तनाव खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिका और इजरायल ने शनिवार को ईरान पर संयुक्त सैन्य कार्रवाई करते हुए कई अहम ठिकानों को निशाना बनाया। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के आवास को भी भारी नुकसान पहुंचा है। हमलों का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पंगु बनाना और उससे जुड़े शीर्ष सैन्य कमांडरों को खत्म करना बताया जा रहा है। उधर, तेहरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि जंग की शुरुआत भले किसी और ने की हो, लेकिन इसे खत्म ईरान करेगा। बढ़ते हालात के बीच भारत सरकार ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी कर सतर्क रहने को कहा है। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल दौरे से लौटे हैं।
भारत-ईरान रिश्तों की पृष्ठभूमि और चाबहार का महत्व
अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्लेटफॉर्म Al Jazeera की रिपोर्ट के अनुसार भारत और ईरान के बीच लंबे समय से रणनीतिक और आर्थिक सहयोग रहा है। 2016 में प्रधानमंत्री मोदी की तेहरान यात्रा के दौरान भारत को ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित रणनीतिक चाबहार बंदरगाह विकसित करने की अनुमति मिली थी। यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया तक सीधा व्यापारिक मार्ग खोलता है और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का रणनीतिक जवाब माना जाता है।
चाबहार परियोजना पर संकट के बादल
विश्लेषण पत्रिका The Diplomat के मुताबिक यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो चाबहार परियोजना की प्रगति पर गंभीर असर पड़ सकता है। भारत ने इस परियोजना में अरबों डॉलर का निवेश किया है। ईरान की अस्थिरता भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी नीति के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है।
रेयर अर्थ और यूरेनियम सप्लाई पर असर
मध्य एशिया भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और रेयर अर्थ मिनरल्स का अहम स्रोत है। भारत की इस क्षेत्र से सीधी सीमा नहीं है, इसलिए ईरान के जरिए संपर्क बेहद जरूरी है। यदि हालात बिगड़ते हैं तो कजाकिस्तान से यूरेनियम आपूर्ति और अन्य खनिज व्यापार प्रभावित हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर की गति भी थम सकती है।
अफगानिस्तान से व्यापारिक संपर्क खतरे में
मिडिल ईस्ट में बढ़ता सैन्य तनाव भारत-अफगानिस्तान व्यापार मार्ग को भी प्रभावित कर सकता है, जो चाबहार के रास्ते संचालित होता है। ऐसे में चीन को अफगानिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर मिल सकता है, क्योंकि वह पहले से पाकिस्तान-अफगानिस्तान-चीन त्रिपक्षीय ढांचे को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और भारत की ऊर्जा सुरक्षा
ईरान के कब्जे वाले रणनीतिक होर्मुज स्ट्रेट से भारत के तेल आयात का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि ईरान इस जलमार्ग को बंद करता है तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ेगा। भारत अपनी 80 से 90 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत पश्चिम एशिया से पूरी करता है। हमलों के बाद वैश्विक तेल कीमतों में उछाल देखा गया है, जो संघर्ष बढ़ने पर और तेज हो सकता है।
30 हजार भारतीयों की सुरक्षा चिंता
इजरायल और ईरान में करीब 30 हजार भारतीय नागरिक रह रहे हैं। इजरायल में लगभग 20 हजार और ईरान में करीब 10 हजार भारतीय छात्र, प्रोफेशनल और कामगार मौजूद हैं। विदेश मंत्रालय ने स्थिति पर नजर रखते हुए यात्रा संबंधी एडवाइजरी जारी की है और नागरिकों से सतर्क रहने को कहा है।
पीएम मोदी की यात्रा और कूटनीतिक संदेश
मिडिल ईस्ट पर नजर रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी का हालिया इजरायल दौरा क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से अहम संदेश देता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह यात्रा दिखाती है कि पिछले एक दशक में भारत-इजरायल संबंध कितने मजबूत हुए हैं और भारत इस क्षेत्र को कितना महत्व देता है।
संतुलन साधने की बड़ी चुनौती
भारत के लिए ईरान और इजरायल दोनों से संतुलित संबंध बनाए रखना आसान नहीं होगा। एक ओर इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग है, तो दूसरी ओर ईरान भारत की कनेक्टिविटी और ऊर्जा सुरक्षा का अहम स्तंभ है। ऐसे में किसी एक पक्ष की खुली नाराजगी भारत की रणनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है।
पाकिस्तान को मिल सकता है रणनीतिक लाभ
विश्लेषकों का आकलन है कि यदि युद्ध लंबा चला तो पाकिस्तान का भू-राजनीतिक महत्व बढ़ सकता है। ईरान की कमजोरी से क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदल सकता है और पाकिस्तान को अमेरिका से अधिक सैन्य व आर्थिक मदद मिलने की संभावना बन सकती है। जनवरी 2024 में ईरान और पाकिस्तान के बीच सीमा पार हमलों की घटनाओं ने पहले ही दोनों देशों के रिश्तों में तनाव दिखा दिया था। ऐसे में बदलते समीकरण भारत के लिए नई कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर सकते हैं।
पश्चिम एशिया में भड़की इस जंग ने केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी हलचल मचा दी है। आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, यह विश्व राजनीति और भारत के रणनीतिक हितों के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकता है।
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