UP Police पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘संविधान नहीं, सत्ता के प्रति ज्यादा वफादारी’, पुलिसिंग सिस्टम पर उठाए गंभीर सवाल

Prayagraj News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि राज्य में पुलिस अधिकारियों की निष्ठा संविधान के बजाय सत्ता में बैठी सरकारों के प्रति अधिक दिखाई देती है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक मशीनरी की जवाबदेही संविधान और कानून के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी राजनीतिक व्यवस्था के प्रति।

गैंगस्टर एक्ट से जुड़े मामले की सुनवाई में आई तल्ख टिप्पणी

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जो उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधि (निवारण) अधिनियम, 1986 से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान अदालत ने केवल मामले के तथ्यों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रदेश की पुलिस व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे को लेकर भी गंभीर टिप्पणियां दर्ज कीं।

‘संवैधानिक शासन को राजनीतिक सुविधा का उपकरण नहीं बनाया जा सकता’

हाईकोर्ट ने कहा कि वर्षों से प्रशासनिक व्यवस्था राजनीतिक प्रभाव के दायरे में रही है। अदालत के अनुसार, संवैधानिक शासन को व्यक्तिगत या राजनीतिक सुविधाओं के आधार पर संचालित नहीं किया जा सकता। राज्य की मशीनरी को कानून और संविधान के प्रति जवाबदेह रहना होगा।

ट्रांसफर-पोस्टिंग व्यवस्था पर भी उठे सवाल

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस अधिकारियों की ट्रांसफर, पोस्टिंग और पदोन्नति अक्सर योग्यता के बजाय राजनीतिक नजदीकियों के आधार पर प्रभावित होती दिखाई देती है। अदालत ने कहा कि पसंदीदा अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिलों और शहरी कमिश्नरेट में तैनाती मिलती है, जबकि स्वतंत्र तरीके से काम करने वाले अधिकारियों को कम महत्व वाले पदों पर भेज दिया जाता है।

‘अधिकारियों की वफादारी संविधान के बजाय सत्ता की ओर’

हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों की ऊर्ध्वाधर निष्ठा संविधान की बजाय सत्तारूढ़ व्यवस्था की ओर झुकी हुई दिखाई देती है। अदालत ने टिप्पणी की कि कई अधिकारी अपने राजनीतिक वरिष्ठों को संतुष्ट करने के लिए निर्णय लेते हैं, जिससे निष्पक्ष प्रशासन और कानून के शासन पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

गिरफ्तारी और FIR प्रक्रिया पर भी अदालत ने जताई चिंता

कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में बिना उचित प्रक्रिया अपनाए गिरफ्तारियां की जाती हैं। कभी-कभी प्राथमिकी दर्ज करने या दबाने में भी दुर्भावनापूर्ण मंशा देखने को मिलती है। अदालत ने यह भी कहा कि निवारक निरोध संबंधी प्रावधानों का कई बार मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, जो कानून के मूल उद्देश्य के विपरीत है।

न्यायिक आदेशों के पालन को लेकर भी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि कई मामलों में न्यायालय के आदेशों का पालन केवल औपचारिक रूप से किया जाता है, जबकि उनके वास्तविक उद्देश्य को कमजोर कर दिया जाता है। अदालत ने इसे कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती बताया।

पुलिस सुधारों और जवाबदेही की जरूरत पर जोर

अदालत ने संकेत दिया कि पुलिस व्यवस्था में संस्थागत सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना संवैधानिक मूल्यों की रक्षा संभव नहीं है। न्यायालय ने प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका और पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र समीक्षा की आवश्यकता पर भी बल दिया।

क्यों महत्वपूर्ण है हाईकोर्ट की यह टिप्पणी?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं मानी जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत ने पुलिस व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही, राजनीतिक हस्तक्षेप और कानून के शासन से जुड़े व्यापक मुद्दों को सामने रखा है। ऐसे समय में जब पुलिस सुधारों की मांग लगातार उठती रही है, यह फैसला प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता और संवैधानिक प्रतिबद्धता पर नई बहस छेड़ सकता है।

Check Also

Solar Didi Salary Hike: सोलर दीदियों की हुई बल्ले-बल्ले, अब हर महीने मिलेगा 14,156 रुपये मानदेय; सीएम योगी ने किए कई बड़े ऐलान

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सौर ऊर्जा को गांव-गांव तक पहुंचाने और महिलाओं को आर्थिक रूप …