सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में शामिल नारद पुराण में जीवन, मृत्यु, लोक-परलोक और कर्मों के फल का विस्तार से वर्णन मिलता है। इस पुराण के अनुसार मनुष्य का हर कर्म मृत्यु के बाद उसके भविष्य को तय करता है। यही कारण है कि व्यक्ति के मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि मृत्यु के बाद आत्मा कहां जाती है, यमलोक का मार्ग कैसा होता है और पाप-पुण्य का फल किस प्रकार प्राप्त होता है।
नारद पुराण में इन सभी रहस्यों का विस्तार से उल्लेख किया गया है। ग्रंथ के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा को यमलोक तक पहुंचने के लिए एक अत्यंत लंबी और कठिन यात्रा से गुजरना पड़ता है। यह मार्ग पापियों के लिए पीड़ादायक और पुण्यात्माओं के लिए सुखद बताया गया है।
नारद पुराण में बताया गया यमलोक का रहस्य
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के बाद जीवात्मा अपने कर्मों के आधार पर यमलोक पहुंचती है। यमराज को कर्मों का न्यायाधीश माना गया है, जो जीवों को उनके अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं।
नारद पुराण के मुताबिक जिसने जीवनभर धर्म, दान-पुण्य और सत्कर्म किए होते हैं, उसकी यमलोक यात्रा शांतिपूर्ण और सुखद होती है। वहीं अधर्म और पाप में लिप्त रहने वाले जीवों को अनेक प्रकार की यातनाओं का सामना करना पड़ता है।
86 हजार योजन तक फैला बताया गया है यमलोक का मार्ग
पुराणों में यमलोक का रास्ता छियासी हजार योजन तक विस्तृत बताया गया है। धार्मिक गणनाओं के अनुसार एक योजन लगभग 13 किलोमीटर के बराबर माना जाता है। इस आधार पर यमलोक की दूरी करीब 11 लाख 18 हजार किलोमीटर बताई जाती है।
मान्यता है कि पुण्यात्माएं इस कठिन मार्ग को बिना किसी कष्ट के पार कर लेती हैं। उन्हें यात्रा के दौरान किसी प्रकार की पीड़ा नहीं होती और वे सुखपूर्वक धर्मराज के धाम तक पहुंच जाती हैं।
इसके विपरीत पाप कर्म करने वाले जीवों के लिए यह मार्ग अत्यंत भयावह माना गया है। कहा जाता है कि ऐसे जीव दर्द और भय से रोते-चिल्लाते हुए यमलोक की ओर बढ़ते हैं।
पाप कर्म करने वालों को भुगतनी पड़ती हैं कठिन यातनाएं
नारद पुराण में वर्णन मिलता है कि पापियों की स्थिति यमलोक की यात्रा में अत्यंत दयनीय हो जाती है। उनके कंठ, तालु और होंठ सूख जाते हैं तथा वे पीड़ा से व्याकुल दिखाई देते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार यमदूत पाप कर्म करने वाले जीवों को दंडित करते हुए यमलोक तक लेकर जाते हैं। मार्ग में उन्हें चाबुक और अन्य प्रकार की यातनाएं सहनी पड़ती हैं। यह वर्णन इस बात का संकेत देता है कि मनुष्य को जीवन में सदैव धर्म और अच्छे कर्मों का पालन करना चाहिए।
दान-पुण्य करने वालों को मिलता है विशेष सुख
पुराणों में यह भी कहा गया है कि जो व्यक्ति अपने जीवन में दान, सेवा, सत्य और धर्म का पालन करता है, उसे मृत्यु के बाद विशेष सम्मान प्राप्त होता है। ऐसे लोगों की आत्मा को यमलोक की यात्रा में किसी प्रकार का भय या दुख नहीं सताता।
धार्मिक दृष्टि से यह संदेश दिया गया है कि मनुष्य को अपने कर्मों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि मृत्यु के बाद वही कर्म उसके सुख और दुख का कारण बनते हैं।
कर्मों के आधार पर तय होता है लोक और परलोक
सनातन मान्यताओं के अनुसार मनुष्य का जीवन केवल इस संसार तक सीमित नहीं है। मृत्यु के बाद भी आत्मा की यात्रा जारी रहती है और उसे अपने कर्मों का फल अवश्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि धर्म ग्रंथों में सद्कर्म, दया, दान और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई है।नारद पुराण का यह वर्णन जीवन को सही दिशा देने वाला माना जाता है, जो मनुष्य को अच्छे कर्म करने और अधर्म से दूर रहने का संदेश देता है।
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