
वॉशिंगटन डीसी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 24 सितंबर को प्रस्तावित मुलाकात से पहले ताइवान को लेकर चिंता बढ़ गई है। ताइवान को आशंका है कि चीन के साथ किसी बड़े आर्थिक या व्यापारिक समझौते तक पहुंचने के लिए ट्रंप ताइवान के मुद्दे पर अमेरिकी रुख में नरमी ला सकते हैं। अमेरिका के एशियाई सहयोगी जापान और दक्षिण कोरिया भी इसी संभावना को लेकर सतर्क नजर आ रहे हैं। ताइवान को सबसे ज्यादा किस बात का डर?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ताइवान की चिंता की एक बड़ी वजह ट्रंप का अमेरिकी हथियारों की बिक्री को लेकर दिया गया रुख है। मई में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत के बाद ट्रंप ने ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री को चीन के साथ बातचीत में एक महत्वपूर्ण ‘नेगोशिएटिंग चिप’ यानी सौदेबाजी के साधन के तौर पर बताया था। अब सितंबर में दोनों नेताओं की अगली मुलाकात से पहले ताइपे को डर है कि बीजिंग एक बार फिर ताइवान का मुद्दा बातचीत की मेज पर ला सकता है।
ताइवान के लिए चिंता इसलिए भी अहम है क्योंकि अमेरिका से मिलने वाली सैन्य सहायता को वह अपनी सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। करीब 14 अरब डॉलर का एक अमेरिकी हथियार पैकेज अभी ट्रंप की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। मई की बैठक के बाद ट्रंप ने इस पैकेज को फिलहाल रोकने की बात कही थी और इसे चीन के साथ बातचीत में इस्तेमाल किए जा सकने वाले साधन के तौर पर पेश किया था।
जापान और अमेरिका के दूसरे सहयोगी भी क्यों चिंतित?
ताइवान के अलावा जापान समेत अमेरिका के कई सहयोगी देश भी वॉशिंगटन की चीन नीति को लेकर बारीकी से नजर रख रहे हैं। जापान की चिंता यह है कि अगर चीन अमेरिका से बड़ी आर्थिक रियायतें या व्यापारिक फायदे हासिल करता है, तो इसके बदले ताइवान के सवाल पर अमेरिकी बयानबाजी या नीति में बदलाव देखने को मिल सकता है।
रॉयटर्स के अनुसार, जापानी अधिकारियों की चिंता है कि ट्रंप चीन से अमेरिकी सामान की खरीद बढ़ाने जैसी आर्थिक प्रतिबद्धताएं हासिल करने के लिए ताइवान के मुद्दे पर अपेक्षाकृत नरम रुख अपना सकते हैं। टोक्यो चाहता है कि अमेरिका ताइवान को लेकर अपनी मौजूदा कूटनीतिक भाषा पर कायम रहे और आगामी शिखर बैठक को मुख्य रूप से ताइवान विवाद पर केंद्रित न किया जाए।
जिनपिंग फिर उठा सकते हैं ताइवान का मुद्दा
अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और भू-राजनीति से जुड़े कई मुद्दों पर मतभेद हैं। इनमें ताइवान सबसे संवेदनशील विषयों में से एक है। बीजिंग ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है और वहां दोबारा एकीकरण के अपने दावे को लगातार दोहराता रहा है। वहीं ताइवान अपनी राजनीतिक व्यवस्था और भविष्य को लेकर अलग रुख रखता है।
मई में ट्रंप और जिनपिंग की बातचीत में भी ताइवान का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया था। ट्रंप ने बाद में बताया था कि जिनपिंग ने उनसे ताइवान, अमेरिकी हथियारों की बिक्री और किसी संभावित संघर्ष की स्थिति में अमेरिकी रुख के बारे में सवाल किए थे।
अमेरिका की नीति में बदलाव का संकेत क्यों अहम?
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की ताइवान नीति को लेकर उसके सहयोगी देशों के लिए सिर्फ आधिकारिक फैसले ही नहीं, बल्कि राष्ट्रपति की बयानबाजी भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। रॉयटर्स से बातचीत में अधिकारियों और विश्लेषकों ने आशंका जताई कि अमेरिकी रुख में मामूली बदलाव भी बीजिंग के आकलन को प्रभावित कर सकता है और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर डाल सकता है।
अमेरिका लंबे समय से ताइवान को हथियार उपलब्ध कराता रहा है। मई में ताइवान के रक्षा मंत्री वेलिंगटन कू ने भी कहा था कि हथियारों की बिक्री ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने यह भी कहा था कि ताइवान अमेरिकी हथियारों की आपूर्ति को लेकर बातचीत जारी रखे हुए है।
चीन-अमेरिका डील के बीच ताइवान क्यों बना बड़ा मुद्दा?
ट्रंप और जिनपिंग की आगामी बातचीत में सिर्फ ताइवान ही मुद्दा नहीं होगा। दोनों देशों के बीच व्यापार, शुल्क, तकनीक, सेमीकंडक्टर, एआई और सुरक्षा से जुड़े विषय भी महत्वपूर्ण हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट की चीनी उपप्रधानमंत्री हे लिफेंग के साथ बैठक भी प्रस्तावित शिखर वार्ता से पहले होने वाली है। दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक बातचीत जारी रखने की कोशिशें चल रही हैं।
ताइवान की रणनीतिक अहमियत का एक और कारण उसका सेमीकंडक्टर उद्योग है। ताइवान दुनिया की उन्नत चिप आपूर्ति श्रृंखला में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ऐसे में ताइवान को लेकर किसी बड़े भू-राजनीतिक तनाव का असर सिर्फ एशिया तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि वैश्विक तकनीकी और आर्थिक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी पड़ सकता है।
24 सितंबर की बैठक पर टिकी नजरें
अब सबकी नजरें 24 सितंबर को होने वाली प्रस्तावित ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात पर हैं। इस बैठक में व्यापार और आर्थिक मुद्दों के साथ ताइवान का सवाल कितना प्रमुख रहता है और ट्रंप इस मुद्दे पर किस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, इस पर ताइवान, जापान और अमेरिका के अन्य सहयोगियों की खास नजर रहेगी। चीन और अमेरिका के बीच बातचीत में ताइवान पहले भी संवेदनशील मुद्दा रहा है और आगामी बैठक में भी इसके महत्वपूर्ण बने रहने की संभावना है।
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