
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए चल रही जननी सुरक्षा योजना (JSY) का असर अब आंकड़ों में भी नजर आने लगा है। चालू वित्तीय वर्ष में 1 अप्रैल से 9 अगस्त 2026 तक प्रदेश में सात लाख से अधिक संस्थागत प्रसव दर्ज किए गए हैं। सरकार का जोर महिलाओं को घर पर प्रसव कराने के बजाय अस्पताल और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने पर है, ताकि प्रसव के दौरान मां और नवजात दोनों को जरूरी चिकित्सकीय सुविधाएं समय पर मिल सकें।
पूर्वांचल से पश्चिमी यूपी तक योजना का असर
उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में जननी सुरक्षा योजना के क्रियान्वयन और लाभार्थियों तक सहायता पहुंचाने में बेहतर प्रदर्शन सामने आया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस, मैनपुरी, फिरोजाबाद, हरदोई, कानपुर देहात, मुजफ्फरनगर और बागपत जैसे जिलों के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर, अंबेडकरनगर और सोनभद्र में भी योजना को प्रभावी ढंग से लागू किया गया है।
सरकार के मुताबिक संस्थागत प्रसव को लेकर बढ़ती जागरूकता सुरक्षित मातृत्व की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव है। अस्पताल में प्रसव होने से गर्भवती महिला को प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की निगरानी, आपात स्थिति में उपचार और नवजात को आवश्यक देखभाल उपलब्ध कराने में मदद मिलती है। इन प्रयासों को मातृ मृत्यु दर (MMR) में कमी लाने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।
ग्रामीण महिलाओं को 1,400 और शहरी क्षेत्र में 1,000 रुपये की मदद
सचिव स्वास्थ्य एवं राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निदेशक डॉ. पिंकी जोवल के अनुसार, जननी सुरक्षा योजना के तहत सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव कराने वाली पात्र गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है। ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को 1,400 रुपये, जबकि शहरी क्षेत्र की महिलाओं को 1,000 रुपये की सहायता प्रदान की जाती है।
इस आर्थिक सहायता का मकसद गर्भवती महिलाओं को संस्थागत प्रसव के लिए प्रोत्साहित करना है। प्रसव से जुड़े खर्चों में मिलने वाली मदद महिलाओं और उनके परिवारों के लिए अस्पताल तक पहुंचने का फैसला आसान बनाती है। योजना के तहत सहायता मिलने से सुरक्षित प्रसव सेवाओं तक महिलाओं की पहुंच बढ़ाने में भी मदद मिलती है।
संस्थागत प्रसव सिर्फ जगह बदलना नहीं, मां और बच्चे की सुरक्षा से जुड़ा
केजीएमयू के स्त्री रोग विभाग की अध्यक्ष डॉ. अंजू अग्रवाल के अनुसार, संस्थागत प्रसव का मतलब केवल प्रसव का स्थान घर से अस्पताल तक बदलना नहीं है। इसका सीधा संबंध प्रसव के दौरान मां और नवजात की सुरक्षा से है। अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव होने पर किसी जटिलता की स्थिति में चिकित्सकीय सहायता और जरूरी उपचार अपेक्षाकृत तेजी से उपलब्ध कराया जा सकता है।
यही वजह है कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से गर्भावस्था के दौरान महिलाओं और उनके परिवारों को संस्थागत प्रसव के फायदे के बारे में जागरूक करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका भी अहम
जननी सुरक्षा योजना का लाभ अधिक से अधिक महिलाओं तक पहुंचाने में जमीनी स्तर पर काम करने वाली आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। आशा कार्यकर्ता गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने, नियमित जांच के लिए प्रेरित करने और प्रसव के लिए स्वास्थ्य संस्थान तक पहुंचने में सहयोग करती हैं।
प्रदेश में योजना के तहत सात लाख से अधिक संस्थागत प्रसव का आंकड़ा इस बात का संकेत है कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव कराने को लेकर महिलाओं की स्वीकार्यता बढ़ रही है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर तक अलग-अलग जिलों में योजना का बेहतर क्रियान्वयन सुरक्षित मातृत्व के लक्ष्य को मजबूत करता दिखाई दे रहा है।
सुरक्षित मातृत्व पर सरकार का फोकस
जननी सुरक्षा योजना के जरिए आर्थिक प्रोत्साहन, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और जमीनी स्तर पर जागरूकता को एक साथ बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। सात लाख से अधिक संस्थागत प्रसव का आंकड़ा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर सामने आया है। सरकार का लक्ष्य है कि अधिक से अधिक गर्भवती महिलाएं सुरक्षित और चिकित्सकीय निगरानी वाले माहौल में प्रसव कराएं, जिससे प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं और मातृ एवं नवजात मृत्यु के जोखिम को कम किया जा सके।
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