
Nag Panchami 2026: सावन शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है। सनातन परंपरा में यह दिन नाग देवताओं की पूजा और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए विशेष माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नागों की पूजा करने से सर्प भय से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। हिंदू धर्मग्रंथों में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और कालिया जैसे कई शक्तिशाली नागों का उल्लेख मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन महानागों की उत्पत्ति कैसे हुई थी? इनके जन्म की कहानी महाभारत के आदिपर्व से जुड़ी है और इसमें महर्षि कश्यप की पत्नियों कद्रू और विनता की कथा बेहद महत्वपूर्ण है।
महर्षि कश्यप से मांगा ऐसा वरदान, जिसने बदल दी नागवंश की कहानी
महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार, सतयुग में दक्ष प्रजापति की दो पुत्रियां थीं—कद्रू और विनता। दोनों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। एक अवसर पर महर्षि कश्यप अपनी दोनों पत्नियों से प्रसन्न हुए और उनसे मनचाहा वरदान मांगने के लिए कहा।
कद्रू ने अपने लिए एक हजार ऐसे पुत्रों का वर मांगा, जो तेज, शक्ति और पराक्रम में समान हों। दूसरी ओर विनता ने संख्या के बजाय अपने पुत्रों की असाधारण क्षमता को महत्व दिया। उन्होंने केवल दो पुत्रों की इच्छा जताई, लेकिन चाहा कि वे बुद्धि, शरीर और पराक्रम में कद्रू के पुत्रों से भी श्रेष्ठ हों।
महर्षि कश्यप ने दोनों की इच्छाओं के अनुसार उन्हें वरदान दे दिया। इसके बाद उन्होंने दोनों को अपने-अपने गर्भ की रक्षा करने और धैर्य बनाए रखने की सलाह दी तथा तपस्या के लिए चले गए।
कद्रू ने दिए एक हजार अंडे, विनता के हिस्से आए दो
समय बीतने पर कद्रू ने एक हजार अंडे दिए, जबकि विनता ने दो अंडे दिए। दोनों ने अपने-अपने अंडों को सुरक्षित स्थान पर रख दिया और संतान के जन्म की प्रतीक्षा करने लगीं।
पौराणिक कथा के अनुसार, लगभग पांच सौ वर्ष बीतने के बाद कद्रू के अंडों से एक-एक करके नाग पुत्रों का जन्म होने लगा। इस तरह कद्रू नागवंश की माता बनीं। दूसरी तरफ विनता के दोनों अंडे अब भी नहीं फूटे थे।
संतान को जन्म लेते देखने की इच्छा में विनता का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने जल्दबाजी में अपने एक अंडे को तोड़ दिया। इसके भीतर से एक बालक प्रकट हुआ, लेकिन उसका शरीर पूरी तरह विकसित नहीं था। कथा में इस बालक को अरुण बताया गया है।
विनता की जल्दबाजी पर अरुण ने दिया श्राप
अपने अधूरे शरीर को देखकर अरुण अपनी माता से नाराज हुए। पौराणिक कथा के मुताबिक, उन्होंने विनता को श्राप दिया कि उनके अधीर होने के कारण उन्हें अपनी सौत कद्रू की दासी बनकर पांच सौ वर्षों तक रहना पड़ेगा।
हालांकि अरुण ने यह भी कहा कि विनता का दूसरा पुत्र उन्हें इस दासता से मुक्त करेगा। साथ ही उन्होंने अपनी माता को चेतावनी दी कि दूसरे अंडे को भी समय से पहले नहीं फोड़ना चाहिए। यदि ऐसा किया गया तो दूसरे पुत्र का भी शरीर पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाएगा।
इसके बाद अरुण आकाश में चले गए और आगे चलकर सूर्यदेव के सारथी बने।
दूसरे अंडे से हुआ गरुड़ का जन्म
समय आने पर विनता के दूसरे अंडे से गरुड़ का जन्म हुआ। कथा के अनुसार, गरुड़ अत्यंत तेजस्वी और शक्तिशाली थे। उनके जन्म से ही उनके असाधारण पराक्रम का परिचय मिलता है। आगे चलकर गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन बने और हिंदू धर्म की पौराणिक परंपरा में उन्हें विशेष स्थान प्राप्त हुआ।
लेकिन विनता की दासता की कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। इसके पीछे कद्रू और विनता के बीच हुई एक ऐसी शर्त थी, जिसने दोनों बहनों के रिश्ते को पूरी तरह बदल दिया।
समुद्र मंथन से निकले दिव्य घोड़े पर हुई शर्त
समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों को अनेक दिव्य वस्तुएं प्राप्त हुईं। इन्हीं में एक अद्भुत सफेद घोड़ा भी था, जिसका नाम उच्चैःश्रवा था।
उच्चैःश्रवा को देखकर कद्रू ने विनता से उसके रंग को लेकर सवाल किया। विनता ने कहा कि घोड़ा पूरी तरह सफेद है। कद्रू ने इसके विपरीत दावा किया कि घोड़े की पूंछ काली है।
दोनों बहनों के बीच विवाद बढ़ा तो उन्होंने शर्त लगा ली। तय हुआ कि यदि उच्चैःश्रवा की पूंछ सफेद निकली तो कद्रू विनता की दासी बनेंगी और यदि पूंछ काली हुई तो विनता को कद्रू की दासी बनना पड़ेगा।
कद्रू की चाल में शामिल हुए नाग पुत्र
कद्रू किसी भी तरह यह शर्त जीतना चाहती थीं। कथा के अनुसार, उन्होंने अपने एक हजार नाग पुत्रों को आदेश दिया कि वे काले बालों का रूप धारण करके उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपट जाएं, ताकि दूर से उसकी पूंछ काली दिखाई दे।
कद्रू के कई नाग पुत्रों ने अपनी माता की इस चाल में साथ देने से इनकार कर दिया। इससे कद्रू बेहद नाराज हो गईं और उन्होंने उन नागों को श्राप दिया कि भविष्य में राजा जनमेजय द्वारा किए जाने वाले सर्प यज्ञ की अग्नि में वे जलकर भस्म हो जाएंगे।
इसी प्रसंग में कर्कोटक नाग का उल्लेख आता है। कथा के अनुसार, कर्कोटक ने अपनी माता की बात मानते हुए काले बालों का रूप धारण करके उच्चैःश्रवा की पूंछ से लिपटने की बात स्वीकार कर ली।
अगले दिन जब कद्रू और विनता उच्चैःश्रवा को देखने पहुंचीं तो घोड़े का शरीर सफेद था, लेकिन उसकी पूंछ काली दिखाई दे रही थी। यह देखकर विनता समझ गईं कि वह शर्त हार चुकी हैं। शर्त के अनुसार उन्हें अपनी बहन कद्रू की दासी बनना पड़ा।
गरुड़ ने ऐसे छुड़ाया अपनी मां को दासता से
विनता की दासता की बात जब गरुड़ को पता चली तो उन्होंने अपनी माता को कद्रू और उसके नाग पुत्रों के बंधन से मुक्त कराने का संकल्प लिया। अपनी मां की मुक्ति के लिए गरुड़ ने अद्भुत पराक्रम किया और देवताओं से अमृत प्राप्त किया।
कथा के अनुसार, गरुड़ ने अमृत नागों के सामने रख दिया और इसके बदले अपनी माता विनता को दासता से मुक्त कराया। उनके इस पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना वाहन बनने का वरदान दिया। इसके बाद गरुड़ भगवान विष्णु के परम प्रिय वाहन के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
शेषनाग, वासुकि, तक्षक और कालिया का कद्रू से क्या संबंध?
पौराणिक कथा के अनुसार, कद्रू के पुत्रों में आगे चलकर कई प्रसिद्ध और शक्तिशाली नागों का वर्णन मिलता है। इनमें शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और कालिया प्रमुख हैं।
इसी वजह से नाग पंचमी पर नाग देवताओं की पूजा के पीछे केवल सर्पों के प्रति श्रद्धा ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी विस्तृत पौराणिक परंपरा भी मानी जाती है। महाभारत में वर्णित कद्रू, विनता, नागों और गरुड़ की यह कथा नागवंश की उत्पत्ति तथा गरुड़-नाग संबंधों को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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