चांद के हरे कांच ने 35 साल बाद खोला पानी का राज, अपोलो 15 के सैंपल ने बदल दी वैज्ञानिकों की पुरानी थ्योरी

चांद को लंबे समय तक एक बेहद सूखी खगोलीय दुनिया माना जाता रहा, लेकिन अपोलो मिशन से पृथ्वी पर लाए गए कुछ बेहद छोटे हरे कांच के दानों ने वैज्ञानिकों की इस धारणा को बड़ा झटका दिया। करीब 35 साल से अधिक समय तक सुरक्षित रहे इन नमूनों की जांच में पानी से जुड़े अहम संकेत मिले। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन कांच के दानों में मिला हाइड्रोजन इस बात का प्रमाण है कि चांद के भीतर प्राचीन समय में पानी मौजूद था। नासा और ब्राउन यूनिवर्सिटी की जानकारी के मुताबिक, यह खोज चंद्रमा के निर्माण और उसके अंदरूनी हिस्से को समझने के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई है।

अपोलो 15 के अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर दिखे थे हरे कण

साल 1971 में नासा के अपोलो 15 मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्री डेविड स्कॉट और जेम्स इरविन चांद की सतह पर वैज्ञानिक नमूने जुटा रहे थे। इसी दौरान उन्हें सामान्य ग्रे-धूसर सतह के बीच कुछ चमकीले हरे रंग के छोटे-छोटे कण दिखाई दिए। शुरुआत में इरविन को भी संदेह था कि रोशनी की वजह से ये कण हरे दिखाई दे रहे होंगे, लेकिन स्कॉट ने उनकी वास्तविक हरी रंगत की पुष्टि की। दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने इन नमूनों को इकट्ठा कर पृथ्वी पर पहुंचाया। बाद में वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि ये कण प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधियों से बने कांच के दाने यानी volcanic glass beads थे।

35 साल बाद खुला ऐसा राज, जिसने बदल दी चांद की कहानी

इन हरे कांच के दानों की असली अहमियत दशकों बाद सामने आई। ब्राउन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक अल्बर्टो साल और उनकी टीम ने आधुनिक तकनीकों की मदद से अपोलो मिशन से लाए गए ज्वालामुखीय कांच के नमूनों का अध्ययन किया। 2008 में शोधकर्ताओं ने इन बेहद छोटे कणों में हाइड्रोजन और पानी के संकेतों का पता लगाया। यह परिणाम इसलिए चौंकाने वाला था क्योंकि उस समय वैज्ञानिकों के बीच यह धारणा मजबूत थी कि चांद के निर्माण के दौरान अत्यधिक गर्म परिस्थितियों के कारण उसके भीतर मौजूद पानी और अन्य वाष्पशील तत्व खत्म हो गए होंगे।

चांद के अंदर पानी कहां से आया?

वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं था कि चांद पर पानी मौजूद है, बल्कि यह भी था कि वह आया कहां से। अपोलो के नमूनों में मिले संकेतों ने संभावना मजबूत की कि पानी केवल चांद की सतह पर बाद में पहुंचा पदार्थ नहीं है, बल्कि उसका कुछ हिस्सा चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से से आया था। शोध के मुताबिक, ये कांच के दाने अरबों साल पहले चांद के भीतर से निकले मैग्मा और ज्वालामुखीय विस्फोटों के दौरान बने थे। इसलिए उनमें संरक्षित हाइड्रोजन चांद के प्राचीन अंदरूनी हिस्से में पानी की मौजूदगी की अहम जानकारी देता है।

पहले माना जाता था कि चांद का अंदरूनी हिस्सा सूखा है

चांद के निर्माण को लेकर लंबे समय तक वैज्ञानिकों का मानना था कि शुरुआती पृथ्वी से हुई विशाल टक्कर के दौरान पैदा हुई अत्यधिक गर्मी ने पानी समेत ज्यादातर वाष्पशील तत्वों को अंतरिक्ष में उड़ा दिया होगा। इस वजह से चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से को लगभग सूखा माना गया। लेकिन अपोलो 15 और अपोलो 17 से वापस लाए गए ज्वालामुखीय कांच के नमूनों पर हुए अध्ययनों ने इस तस्वीर को बदल दिया। ब्राउन यूनिवर्सिटी के अनुसार, बाद के अध्ययनों ने भी संकेत दिया कि चांद के कुछ हिस्सों का मेंटल पानी से पूरी तरह खाली नहीं है।

अपोलो 15 क्यों था खास?

अपोलो 15 जुलाई 1971 में चांद पर पहुंचा था और इसे नासा के ऐसे मिशन के रूप में तैयार किया गया था जिसमें वैज्ञानिक अध्ययन पर विशेष जोर दिया गया। यह नासा के जे-टाइप मून मिशनों में पहला मिशन था। डेविड स्कॉट और जेम्स इरविन ने लूनर रोविंग व्हीकल की मदद से हैडली-एपेनाइन क्षेत्र में चांद की सतह का व्यापक अध्ययन किया और चट्टानों तथा मिट्टी के नमूने जुटाए। ब्राउन यूनिवर्सिटी के मुताबिक, दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद की सतह पर कुल 18 घंटे से अधिक समय तक गतिविधियां कीं और लगभग 77 किलोग्राम चट्टान व मिट्टी पृथ्वी पर वापस लाई गई।

हरे कांच के दाने आज भी क्यों हैं महत्वपूर्ण?

अपोलो मिशनों से मिले ये नमूने सिर्फ चांद के अतीत को समझने के लिए उपयोगी नहीं हैं, बल्कि भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। बाद के शोध में चांद की कई प्राचीन ज्वालामुखीय संरचनाओं में पानी के संकेत मिले। वैज्ञानिकों ने यह संभावना भी जताई है कि भविष्य में यदि इन स्थानों पर मौजूद पानी पर्याप्त मात्रा में और तकनीकी रूप से सुलभ पाया जाता है, तो इसका इस्तेमाल अंतरिक्ष यात्रियों के लिए संसाधन के तौर पर किया जा सकता है।

चांद को लेकर पुरानी सोच क्यों बदली?

हरे कांच के इन छोटे-छोटे दानों ने एक बड़ी वैज्ञानिक धारणा को चुनौती दी। कभी जिस चांद को लगभग पूरी तरह सूखी दुनिया माना जाता था, अब उसके इतिहास में पानी की भूमिका पर गंभीरता से अध्ययन किया जा रहा है। नासा के अनुसार, अपोलो नमूनों में ज्वालामुखीय कांच के भीतर हाइड्रोजन मिलने से संकेत मिला कि प्राचीन चांद के ज्वालामुखीय विस्फोटों के समय उसके अंदर पानी मौजूद था। यानी करीब 35 साल तक वैज्ञानिकों के पास मौजूद ये छोटे नमूने आखिरकार चांद के अंदर छिपे पानी के इतिहास की बड़ी कहानी सामने लाने में कामयाब हुए।

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