पाकिस्तान के दो बड़े सूबों में बढ़ी बगावत की आंच, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सरकार की पकड़ पर उठे सवाल

पाकिस्तान इस समय आंतरिक सुरक्षा और राजनीतिक चुनौतियों के सबसे कठिन दौर से गुजरता नजर आ रहा है। देश के चार प्रमुख सूबों में से दो—बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा—में हालात लगातार जटिल होते जा रहे हैं। एक ओर बलूचिस्तान में अलगाववादी संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) अपनी गतिविधियां तेज कर रहा है, वहीं दूसरी ओर खैबर पख्तूनख्वा में तालिबान समर्थित समूहों का प्रभाव लगातार बढ़ने की बात सामने आ रही है। इन हालातों ने पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

बलूचिस्तान में बढ़ी अलगाववादी गतिविधियां, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा बलूचिस्तान देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा है। ईरान से लगी इसकी सीमा और दूर-दूर तक फैले पहाड़ी व रेगिस्तानी इलाके लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने हुए हैं।

स्थानीय स्तर पर सक्रिय अलगाववादी संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) अलग राष्ट्र की मांग को लेकर लगातार अभियान चला रहा है। स्थानीय दावों के अनुसार, सूबे के बड़े हिस्से में विद्रोही समूहों और पश्तून गुटों का प्रभाव बढ़ा है। ऐसे में सवाल केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भी उठ रहा है कि प्रशासन आम नागरिकों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराने में कितना सक्षम है।

हाईवे, बाजार और सरकारी संस्थानों पर बढ़ा दबाव

बलूचिस्तान के कई इलाकों में सुरक्षा हालात को लेकर चिंता जताई जा रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, हथियारबंद समूह समय-समय पर क्वेटा, खुजदार और मस्तुंग जैसे क्षेत्रों में प्रवेश कर पुलिस चौकियों और सरकारी कार्यालयों को निशाना बनाते रहे हैं।

कई स्थानों पर सड़कों पर अस्थायी नाके लगाए जाने, वाहनों की तलाशी लेने और कथित तौर पर वसूली किए जाने जैसी घटनाओं की भी चर्चा है। इन गतिविधियों को लेकर पाकिस्तान सरकार पर क्षेत्र में प्रभावी प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

खनिज संपदा और ग्वादर पोर्ट बना असंतोष का बड़ा कारण

बलूचिस्तान प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध माना जाता है। यहां मौजूद खनिज संपदा और रणनीतिक महत्व वाले ग्वादर पोर्ट को लेकर स्थानीय लोगों के बीच लंबे समय से असंतोष देखने को मिलता रहा है।

खुजदार के निवासी मोमिन का कहना है कि ग्वादर पोर्ट पर चीन की भूमिका लगातार बढ़ी है। उनका आरोप है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर निवेश हुआ, लेकिन स्थानीय लोगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया। उनका दावा है कि समुद्री क्षेत्र में चीनी मछली पकड़ने वाली नौकाओं की मौजूदगी बढ़ने से पारंपरिक बलूच मछुआरों की आजीविका प्रभावित हुई है।

स्थानीय लोगों ने खनिज संपदा को लेकर भी जताई नाराजगी

स्थानीय निवासी असलम का कहना है कि बलूचिस्तान की प्राकृतिक संपदा का लाभ बाहरी शक्तियों और केंद्र सरकार को अधिक मिल रहा है, जबकि स्थानीय आबादी खुद को उपेक्षित महसूस करती है। उनका आरोप है कि क्षेत्र के दुर्लभ खनिज संसाधनों पर स्थानीय समुदाय की भागीदारी सीमित है और यही असंतोष समय के साथ व्यापक विरोध का कारण बनता जा रहा है।

खैबर पख्तूनख्वा में भी बढ़ी सुरक्षा चुनौती

बलूचिस्तान के साथ-साथ खैबर पख्तूनख्वा में भी सुरक्षा हालात पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। सीमा से लगे इस क्षेत्र में तालिबान समर्थित गतिविधियों और समय-समय पर होने वाले हमलों ने सुरक्षा एजेंसियों की मुश्किलें बढ़ाई हैं। लगातार हो रही हिंसक घटनाओं के कारण क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना पाकिस्तान सरकार के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैन्य कार्रवाई से हालात पूरी तरह सामान्य करना आसान नहीं होगा। यदि स्थानीय असंतोष, विकास, रोजगार और संसाधनों में भागीदारी जैसे मुद्दों का समाधान नहीं किया गया तो पाकिस्तान के इन दोनों संवेदनशील सूबों में चुनौतियां आगे भी बनी रह सकती हैं। मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा आने वाले समय में पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा नीति की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो सकते हैं।

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