
वॉशिंगटन: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुआ रक्षा समझौता इन दिनों अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस समझौते को कई स्तरों पर ‘इस्लामिक नाटो’ की संज्ञा दी जा रही है। इसकी सबसे अहम वजह समझौते में शामिल वह प्रावधान है, जिसके तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में उसे सभी देशों पर हमला माना जा सकता है। पाकिस्तान में इस समझौते को लेकर उत्साह है, जबकि अमेरिका और ईरान समेत पश्चिम एशिया के कई देशों की नजर भी इस नई सुरक्षा व्यवस्था पर है।
इसी बीच पाकिस्तानी मूल की जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट आएशा सिद्दीका ने इस रक्षा समझौते को लेकर एक बड़ा दावा किया है। उनका कहना है कि अमेरिका ने पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच इस सुरक्षा समझौते को जानबूझकर मंजूरी दी है। उनके मुताबिक, इसके पीछे अमेरिका की रणनीति सऊदी अरब को परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ने से रोकना और उसे वैकल्पिक सुरक्षा कवच उपलब्ध कराना हो सकती है।
क्या सऊदी अरब की परमाणु महत्वाकांक्षा है वजह?
आएशा सिद्दीका के दावे के मुताबिक, अमेरिका की रणनीति को केवल तीन देशों के बीच हुए रक्षा समझौते के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे मध्य पूर्व की बदलती सुरक्षा व्यवस्था और सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताओं का भी असर हो सकता है। उनका मानना है कि अगर किसी देश को अपनी सुरक्षा के लिए भरोसेमंद बाहरी गारंटी मिल जाती है तो उसके लिए स्वतंत्र परमाणु प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने का दबाव कम हो सकता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सऊदी अरब को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए इस रक्षा समझौते को अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बताने वाला दावा आएशा सिद्दीका का विश्लेषण है। इसे अमेरिका या सऊदी अरब की ओर से घोषित आधिकारिक उद्देश्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।
‘इस्लामिक नाटो’ क्यों कहा जा रहा है?
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग को ‘इस्लामिक नाटो’ कहे जाने की सबसे बड़ी वजह इसकी सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा है। नाटो के आर्टिकल 5 में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने को सभी सदस्यों पर हमला माना जाता है। इसी तरह का सुरक्षा प्रावधान इस नए रक्षा समझौते को लेकर चर्चा में है।
इस व्यवस्था से तीनों देशों के बीच सैन्य सहयोग और रणनीतिक समन्वय को नया आयाम मिलने की संभावना जताई जा रही है। खासतौर पर पाकिस्तान के लिए यह समझौता पश्चिम एशिया में उसकी रणनीतिक भूमिका को मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है।
अमेरिका मध्य पूर्व से कम कर रहा है सैन्य मौजूदगी?
आएशा सिद्दीका के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को कम करने की कोशिश करते रहे हैं। उनके अनुसार, ट्रंप की नीति का एक अहम पहलू यह रहा है कि अमेरिकी सैनिकों को दूसरे देशों में लंबे समय तक युद्ध या तैनाती में बनाए रखने से बचा जाए।
उन्होंने कहा कि जब भी अमेरिकी सैनिक विदेशों में लड़ाई में शामिल होते हैं या तैनाती के दौरान मारे जाते हैं, तब ट्रंप ने अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने की बात कही है। उनके अनुसार, यूरोप और मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को नए सिरे से व्यवस्थित करने की प्रक्रिया भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
अमेरिकी वापसी के बाद कौन भरेगा खाली जगह?
आएशा सिद्दीका ने मध्य पूर्व की बदलती स्थिति को लेकर सवाल उठाया कि अगर अमेरिका क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाता है तो पैदा होने वाली रणनीतिक जगह को कौन भरेगा। उनके मुताबिक, पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग इस सवाल का एक संभावित जवाब हो सकता है।
उनका तर्क है कि यदि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा के लिए आपसी सैन्य सहयोग को मजबूत करते हैं तो अमेरिका अपनी प्रत्यक्ष सैन्य मौजूदगी कम करने के बावजूद मध्य पूर्व में रणनीतिक प्रभाव बनाए रख सकता है। इस लिहाज से तीनों देशों के बीच हुआ समझौता अमेरिका के लिए सीधे तौर पर नुकसानदेह नहीं, बल्कि उसकी व्यापक क्षेत्रीय रणनीति के अनुकूल हो सकता है।
सऊदी अरब-अमेरिका परमाणु समझौता भी चर्चा में
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच परमाणु सहयोग को लेकर भी पहले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होती रही है। इस सहयोग को लेकर परमाणु गतिविधियों की निगरानी और सुरक्षा मानकों से जुड़े सवाल उठाए जाते रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान और तुर्की के साथ सऊदी अरब का रक्षा सहयोग मध्य पूर्व की परमाणु और सुरक्षा राजनीति के संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तीन देशों का यह रक्षा समझौता केवल आपसी सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की पहल है या इसके पीछे अमेरिका की मध्य पूर्व नीति से जुड़ी कोई बड़ी रणनीतिक गणित भी काम कर रही है। आएशा सिद्दीका का विश्लेषण इसी दिशा की ओर इशारा करता है, लेकिन अमेरिकी सरकार ने इस समझौते का उद्देश्य सऊदी अरब को परमाणु शक्ति बनने से रोकना बताया है, ऐसा कोई आधिकारिक बयान इस रिपोर्ट में सामने नहीं है।
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