उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातिगत समीकरण हमेशा से चुनावी नतीजों की दिशा तय करते आए हैं। इनमें मल्लाह, निषाद, केवट और बिंद जैसी उप-जातियों वाला नदी किनारे और तटीय इलाकों का यह समुदाय राज्य की सियासत में एक बेहद मजबूत और निर्णायक वोट बैंक माना जाता है। खासकर पूर्वांचल के कई जिलों में इस समाज की राजनीतिक और सामाजिक पकड़ इतनी मजबूत है कि कई सीटों पर हार-जीत सीधे इसी समुदाय के पाले में जाती है। आइए जानते हैं कि यूपी की राजनीति में मल्लाह समाज का कितना प्रभाव है और किन सीटों पर इनका दबदबा है।
किन क्षेत्रों और सीटों पर है सबसे मजबूत वोटबैंक?
मल्लाह और निषाद समुदाय मुख्य रूप से उन इलाकों में केंद्रित है जहाँ नदियाँ (गंगा, यमुना, घाघरा, सरयू, राप्ती) बहती हैं या जो तटीय इलाके हैं।
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पूर्वांचल का गढ़: गोरखपुर, संत कबीर नगर, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर, वाराणसी, देवरिया, आज़ाद नगर, मऊ और चंदौली जैसे जिलों में इनकी आबादी अच्छी-खासी है।
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केन्द्रीय और तटीय उत्तर प्रदेश: इसके अलावा प्रयागराज, मिर्जापुर, फतेहपुर, कानपुर, अयोध्या (फाजाबाद) और सुल्तानपुर के तटीय विधानसभा क्षेत्रों में भी इस समाज के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
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प्रभावित सीटें: अनुमान के मुताबिक, यूपी की लगभग 60 से 70 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहाँ निषाद-मल्लाह मतदाता हार-जीत के समीकरण को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।
सत्ता और राजनीति में कितना है दखल?
पिछले कुछ वर्षों में मल्लाह और निषाद समाज ने राजनीतिक रूप से अपनी संगठित ताकत का अहसास कराया है।
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किंगमेकर की भूमिका: राजनीतिक दल अब इस समुदाय को केवल वोटर नहीं बल्कि एक सशक्त राजनीतिक भागीदार के रूप में देखते हैं। यही वजह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस वोट बैंक को साधने के लिए लगातार प्रयास करते रहते हैं।
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समीकरण और गठबंधन: उत्तर प्रदेश की राजनीति में निषाद पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल इस समुदाय की नुमाइंदगी करते हुए प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन कर सत्ता में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करते आए हैं। सरकार और मंत्रिमंडल में भी इस समाज के नेताओं को प्रतिनिधित्व मिलने से प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में इनका दखल बढ़ा है।
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