उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सियासी पारा चढ़ गया है। चुनाव आयोग द्वारा राज्यसभा की 10 सीटों और विधान परिषद (MLC) की 11 सीटों (5 स्नातक और 6 शिक्षक क्षेत्र) के लिए जारी चुनावी कार्यक्रम ने प्रदेश के दो प्रमुख राजनीतिक धड़ों—भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा)—के बीच सीधी जंग का बिगुल फूंक दिया है। विधान परिषद की सीटों के लिए मतदान 23 अक्टूबर को होना है। इस चुनावी मुकाबले को 2027 के ‘सत्ता संग्राम का सेमीफाइनल’ माना जा रहा है।
1. राज्यसभा की 10वीं सीट: फ्लोर मैनेजमेंट और क्रास-वोटिंग की परीक्षा
विधानसभा में संख्या बल के लिहाज से बीजेपी अपने सहयोगी दलों के साथ आसानी से 7 राज्यसभा सीटें जीतने की स्थिति में है, जबकि समाजवादी पार्टी अपने विधायकों के बल पर 2 सीटें सुरक्षित कर सकती है।
असली रोमांच 10वीं सीट (बीजेपी की 8वीं या सपा की 3री सीट) को लेकर बन रहा है। दोनों ही दलों को इस सीट पर जीत दर्ज करने के लिए अतिरिक्त वोटों और फ्लोर-मैनेजमेंट की आवश्यकता होगी। यह मुकाबला दोनों पार्टियों के अंदरूनी अनुशासन और विधायकों की निष्ठा की सीधी परीक्षा लेगा।
2. MLC चुनाव: राज्य के ‘बुद्धिजीवी वर्ग’ का मूड इंडिकेटर
विधान परिषद की 11 सीटों (स्नातक व शिक्षक कोटे) पर चुनाव सीधे शिक्षित स्नातकों और शिक्षकों के वोटों से तय होता है। यह वर्ग राज्य के राजनीतिक नैरेटिव और ओपिनियन को बनाने में अहम भूमिका निभाता है।
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बीजेपी की रणनीति: पार्टी बुद्धिजीवी वर्ग और शहरी मतदाताओं को अपने साथ जोड़कर 2020 की तुलना में सभी 11 सीटों पर क्लीन स्वीप करने के लक्ष्य के साथ उतर रही है।
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सपा का ‘PDA’ दांव: अखिलेश यादव की अगुआई में समाजवादी पार्टी अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और शिक्षकों-कर्मचारियों से जुड़े जमीनी मुद्दों के दम पर जीत का दावा कर रही है।
3. 2027 से पहले मनोवैज्ञानिक बढ़त का सवाल
विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही यह 21 सीटों का संयुक्त मुकाबला (10 राज्यसभा + 11 MLC) राजनीतिक माहौल की दिशा तय करेगा। जो भी दल इन चुनावों में बढ़त बनाएगा, उसे 2027 के मुख्य चुनाव से ठीक पहले अपने कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने और विपक्षी खेमे को बैकफुट पर धकेलने का बड़ा मनोवैज्ञानिक लाभ हासिल होगा।
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