
चीन की नौसैनिक ताकत लगातार बढ़ रही है, लेकिन बीजिंग अब युद्धपोतों की संख्या बढ़ाने के साथ एक ऐसी रणनीति पर भी काम कर रहा है, जो युद्ध की स्थिति में विरोधी देशों के लिए नई चुनौती बन सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन नागरिक कार्गो जहाजों को जरूरत पड़ने पर सैन्य अभियानों में इस्तेमाल करने की योजना को आगे बढ़ा रहा है। इस रणनीति के तहत सामान्य दिखने वाले मालवाहक जहाजों को हथियारों और मिसाइलों की तैनाती के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
कार्गो जहाजों को युद्धक जहाज बनाने की तैयारी
चीन के पास संख्या के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी नौसेनाओं में से एक नहीं, बल्कि सबसे बड़ी नौसेना है और वह लगातार नए युद्धपोत, पनडुब्बियां और एयरक्राफ्ट कैरियर तैयार कर रहा है। इसके बावजूद बीजिंग अपनी समुद्री सैन्य क्षमता को और विस्तार देने की कोशिश में जुटा है। इसी कड़ी में नागरिक और वाणिज्यिक जहाजों को युद्धकालीन अभियानों के लिए इस्तेमाल करने की योजना सामने आई है।
इस रणनीति का सबसे अहम पहलू यह है कि सामान्य कार्गो जहाजों को जरूरत के समय हथियारों की तैनाती के लिए इस्तेमाल किया जा सके। यानी जिस जहाज को दूर से देखने पर एक सामान्य मालवाहक पोत समझा जाए, वही युद्ध की स्थिति में मिसाइल या दूसरे सैन्य उपकरणों को तैनात करने का माध्यम बन सकता है। ऐसी व्यवस्था से किसी विरोधी के लिए यह पहचानना मुश्किल हो सकता है कि समुद्र में मौजूद कौन सा जहाज वास्तव में सैन्य अभियान का हिस्सा है।
चीन तैयार करेगा खास डेटाबेस
रिपोर्ट के अनुसार, चीन जल्द ही एक ऐसा डेटाबेस तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है, जिसमें नागरिक जहाजों से जुड़ी जानकारी को युद्धकालीन जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया जा सके। इसका उद्देश्य जरूरत पड़ने पर कार्गो जहाजों को सैन्य अभियानों के अनुरूप इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित करना बताया जा रहा है।
ऐसी योजना सफल होने पर चीन के पास सैन्य जहाजों के अलावा नागरिक समुद्री बेड़े का भी इस्तेमाल करने का विकल्प होगा। इससे युद्ध के दौरान उसकी समुद्री लॉजिस्टिक्स और सैन्य तैनाती की क्षमता बढ़ सकती है।
फॉकलैंड युद्ध से लिया गया उदाहरण
बीजिंग की शीर्ष आर्थिक योजना एजेंसी से जुड़े एक रक्षा शोधकर्ता ने चीन की सरकार से युद्धकालीन अभियानों के लिए नागरिक जहाजों को अपने नियंत्रण में लेने की योजनाओं में तेजी लाने की अपील की है। इसके लिए शोधकर्ता ने 1982 के फॉकलैंड संघर्ष का उदाहरण दिया।
शोधकर्ता के मुताबिक, उस संघर्ष के दौरान ब्रिटेन ने अर्जेंटीना के खिलाफ अभियान में वाणिज्यिक जहाजों का इस्तेमाल किया था। चीन में रक्षा उद्योग से जुड़े एक प्रकाशन में पिछले महीने प्रकाशित लेख में इस रणनीति का उल्लेख किया गया है। लेख का शीर्षक ‘डिफेंस इंडस्ट्री कन्वर्जन इन चाइना’ बताया गया है।
दुश्मन के लिए पहचानना हो सकता है मुश्किल
इस तरह की रणनीति का सबसे बड़ा सैन्य फायदा यह हो सकता है कि वाणिज्यिक जहाजों और सैन्य प्लेटफॉर्म के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाए। अगर किसी कार्गो जहाज में युद्धक क्षमता जोड़ दी जाती है, तो विरोधी के लिए समुद्री क्षेत्र में मौजूद जहाजों की निगरानी और खतरे का आकलन करना ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
चीन की योजना को इसी वजह से भारत और अमेरिका समेत उन देशों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनकी समुद्री सुरक्षा सीधे तौर पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र के घटनाक्रम से जुड़ी है। जापान, ताइवान, फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर भी इसका रणनीतिक असर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है चीन की यह तैयारी?
भारत और चीन के बीच लंबे समय से रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बनी हुई है और हिंद महासागर तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की समुद्री गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में चीन अगर अपने नागरिक समुद्री बेड़े को भी युद्धकालीन अभियानों के लिए तैयार करता है, तो इससे समुद्री सुरक्षा का समीकरण और जटिल हो सकता है।
खास तौर पर ऐसे कार्गो जहाज, जिनकी बाहरी पहचान सैन्य पोत जैसी न हो, निगरानी और खुफिया आकलन के लिहाज से चुनौती पैदा कर सकते हैं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि चीन ने बड़े पैमाने पर कार्गो जहाजों को युद्धपोतों में बदलना शुरू कर दिया है। फिलहाल सामने आई जानकारी चीन की ऐसी क्षमता विकसित करने की योजना और उस पर चर्चा की ओर इशारा करती है।
चीन की नौसैनिक शक्ति बढ़ाने की कोशिश जारी
चीन पहले ही बड़ी संख्या में युद्धपोतों के निर्माण और नौसैनिक आधुनिकीकरण पर जोर दे रहा है। इसके साथ नागरिक समुद्री संसाधनों को सैन्य जरूरतों के लिए इस्तेमाल करने की क्षमता विकसित करने की कोशिश उसकी व्यापक समुद्री रणनीति का एक और हिस्सा हो सकती है।
अगर बीजिंग इस मॉडल को प्रभावी ढंग से लागू करता है, तो भविष्य में युद्ध के समय उसके पास केवल पारंपरिक युद्धपोत ही नहीं, बल्कि जरूरत के मुताबिक सैन्य भूमिका निभाने वाले वाणिज्यिक जहाजों का विकल्प भी मौजूद हो सकता है। यही वजह है कि चीन की इस नई योजना पर भारत, अमेरिका और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के दूसरे देशों की नजर बनी रह सकती है।
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