‘घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की चुप्पी को संदेह का आधार न मानें’, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी; उम्रकैद में बदली फांसी की सजा

घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न का शिकार हुई महिलाओं के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा है कि शोषण का शिकार होने के बाद महिलाओं का चुप रहना या तुरंत शिकायत न दर्ज कराना एक सामान्य बात है। इस चुप्पी को आधार बनाकर पीड़िता या गवाह की गवाही पर संदेह नहीं किया जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि न्यायिक प्रक्रियाओं को घर के भीतर होने वाले शोषण की वास्तविक परिस्थितियों और महिलाओं की व्यावहारिक मजबूरियों को ध्यान में रखते हुए काम करना चाहिए।

सौतेली बेटी के यौन शोषण और हत्या मामले में आया फैसला

शीर्ष अदालत की यह अहम टिप्पणी छह साल की मासूम सौतेली बेटी के साथ बार-बार यौन शोषण करने और उसकी निर्मम हत्या के दोषी की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। इस मामले में दोषी की ओर से दलील दी गई थी कि उसकी पत्नी (पीड़िता की मां) की गवाही के आधार पर उसे सजा नहीं दी जा सकती, क्योंकि पत्नी ने इस पूरे अपराध को लेकर लंबे समय तक चुप्पी साधे रखी थी। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि चश्मदीद गवाह होने के बावजूद किसी महिला का तुरंत आवाज न उठा पाना उसकी मजबूरी और डर का परिणाम हो सकता है।

फांसी की सजा उम्रकैद में तब्दील, हाई कोर्ट के फैसले में संशोधन

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ के नवंबर 2019 के फैसले में संशोधन किया। हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि और मौत की सजा को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने 157 पन्नों के विस्तृत फैसले में दोषी की मौत की सजा को बिना किसी छूट के ताउम्र जेल (उम्रकैद) की सजा में बदल दिया।

अदालतों को किया खबरदार: शोषण करने वाले को न मिले मजबूरी का फायदा

पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि घर के भीतर होने वाली हिंसा और उत्पीड़न की घटनाओं में चश्मदीद गवाहों की स्थिति बहुत संवेदनशील होती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटनाओं की बारीकियों को समझने वाली अदालतों को बेहद सतर्क रहना चाहिए। अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी स्थिति में हिंसा और शोषण करने वाला व्यक्ति पीड़िता या महिला गवाह की सामाजिक और पारिवारिक मजबूरियों का अनुचित लाभ न उठा सके।

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