
मेघालय में यूरेनियम खनन को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। राज्य विधानसभा ने यूरेनियम की खोज, खनन और अयस्क प्रोसेसिंग का विरोध करते हुए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया है। राज्य सरकार की सबसे बड़ी चिंता रेडियोधर्मी रिसाव और खनन से निकलने वाले पानी को लेकर है, जिसके असम और बांग्लादेश की ओर बहने वाली जल प्रणालियों तक पहुंचने की आशंका जताई गई है।
मेघालय विधानसभा ने यूरेनियम खनन के खिलाफ पास किया प्रस्ताव
नई दिल्ली: भारत के यूरेनियम भंडार से जुड़ा मेघालय का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। मेघालय विधानसभा ने राज्य में यूरेनियम की खोज, खनन और प्रोसेसिंग का विरोध करते हुए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया है। प्रस्ताव के जरिए केंद्रीय खान मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) से आग्रह किया गया है कि मेघालय में यूरेनियम से जुड़ी ऐसी किसी भी गतिविधि को अनुमति न दी जाए, आगे न बढ़ाया जाए और न ही शुरू किया जाए।
इस फैसले ने भारत के परमाणु ऊर्जा संसाधनों और मेघालय की पर्यावरण संबंधी चिंताओं के बीच खड़े टकराव को फिर सामने ला दिया है। खासतौर पर राज्य में मौजूद यूरेनियम के अनुमानित बड़े भंडार को देखते हुए इस फैसले का महत्व और बढ़ जाता है।
मेघालय में कितना बड़ा है यूरेनियम का भंडार?
मेघालय में अनुमानित 9.22 मिलियन टन यूरेनियम भंडार मौजूद है। यह मात्रा भारत के कुल यूरेनियम भंडार का करीब 16 प्रतिशत बताई गई है। इस लिहाज से मेघालय देश का तीसरा सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार वाला क्षेत्र है।
इसी वजह से मेघालय में यूरेनियम खनन लंबे समय से एक अहम मुद्दा रहा है। एक तरफ देश की परमाणु ऊर्जा जरूरतों के लिए यूरेनियम जैसे संसाधन महत्वपूर्ण हैं, तो दूसरी ओर राज्य में इसके खनन को लेकर पर्यावरण और जल संसाधनों से जुड़े सवाल उठते रहे हैं।
डोमियासियाट-मावथाबाह इलाके को लेकर सबसे बड़ी चिंता
मेघालय की विधानसभा ने जिस मुद्दे को लेकर चिंता जताई है, उसका संबंध डोमियासियाट-मावथाबाह सैंडस्टोन पठार से है। राज्य का कहना है कि यहां से होने वाला रेडियोधर्मी रिसाव और खनन गतिविधियों से निकलने वाला पानी आसपास की जल प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है।
मेघालय की चिंता केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं है। उसका कहना है कि इस इलाके से निकलने वाली जल प्रणालियां आगे असम और बांग्लादेश की दिशा में बहती हैं। ऐसे में खनन से होने वाला संभावित प्रदूषण सीमा पार तक असर डाल सकता है।
असम और बांग्लादेश क्यों बन रहे हैं चिंता का कारण?
यूरेनियम खनन को लेकर मेघालय की आपत्ति का एक महत्वपूर्ण पहलू जल प्रवाह से जुड़ा है। राज्य के मुताबिक, यदि खनन क्षेत्र से रेडियोधर्मी तत्व या दूषित पानी जल प्रणालियों में पहुंचता है, तो इसका असर उन क्षेत्रों तक जा सकता है जिनका जल प्रवाह असम और बांग्लादेश की ओर है।
यही कारण है कि मेघालय इस मामले को केवल खनन की अनुमति से जुड़ा स्थानीय विषय नहीं मान रहा है। राज्य की चिंता पर्यावरण, जल स्रोतों और संभावित सीमा-पार प्रभावों से भी जुड़ी हुई है।
केंद्र के सामने अब क्या चुनौती है?
मेघालय विधानसभा के प्रस्ताव के बाद केंद्र सरकार के सामने यूरेनियम संसाधनों के इस्तेमाल और राज्य की पर्यावरणीय चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। राज्य ने स्पष्ट रूप से केंद्रीय खान मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा विभाग से मेघालय में यूरेनियम की खोज, खनन और अयस्क प्रोसेसिंग की गतिविधियों को आगे नहीं बढ़ाने का आग्रह किया है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मेघालय में मौजूद अनुमानित 9.22 मिलियन टन यूरेनियम भंडार देश के कुल भंडार का एक बड़ा हिस्सा माना जाता है। ऐसे में इस संसाधन के इस्तेमाल को लेकर राज्य और केंद्र के बीच सहमति अहम होगी।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यूरेनियम?
यूरेनियम परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण संसाधन है। भारत की परमाणु ऊर्जा व्यवस्था के लिहाज से घरेलू यूरेनियम संसाधनों का महत्व काफी अधिक है। यही वजह है कि मेघालय जैसे क्षेत्रों में मौजूद भंडार को लेकर लंबे समय से रणनीतिक और आर्थिक नजरिया भी महत्वपूर्ण रहा है।
लेकिन मेघालय का मौजूदा प्रस्ताव यह सवाल फिर खड़ा करता है कि प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा और जल संसाधनों की रक्षा को किस तरह सुनिश्चित किया जाए।
फिलहाल मेघालय विधानसभा के सर्वसम्मत प्रस्ताव ने राज्य में यूरेनियम खनन को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है। एक ओर देश के लिए बड़े यूरेनियम भंडार का इस्तेमाल अहम है, वहीं दूसरी ओर मेघालय रेडियोधर्मी रिसाव और जल प्रदूषण के संभावित खतरे को लेकर गंभीर चिंता जता रहा है। असम और बांग्लादेश की ओर जाने वाली जल प्रणालियों का मुद्दा इस पूरे विवाद को और संवेदनशील बना देता है।
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