स्वरा भास्कर के समर्थन में उतरे मौलाना साजिद रशीदी, बोले- इतिहास में ऐसा कोई वाकया नहीं जहां बादशाह ने महिला को बंदी बनाकर अपराध किया हो

Swara Bhasker Jauhar Controversy: अभिनेत्री स्वरा भास्कर के फिल्म ‘पद्मावत’ में दिखाए गए जौहर के दृश्य पर दिए बयान को लेकर छिड़ी बहस अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। इस विवाद के बीच ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने स्वरा भास्कर का समर्थन किया है। उन्होंने जौहर को बहादुरी से जोड़ने पर सवाल उठाया और इतिहास में महिलाओं के साथ बादशाहों के कथित व्यवहार को लेकर भी अपनी राय रखी।

मौलाना साजिद रशीदी ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि स्वरा भास्कर ने एक महत्वपूर्ण बात कही है। उनका कहना था कि यदि कोई महिला दुष्कर्म की पीड़िता होने के बावजूद जिंदा रहती है, तो उसे कायर नहीं कहा जा सकता और न ही उसके सामने अपनी जान खत्म करने को सम्मान या बहादुरी के रूप में पेश किया जाना चाहिए।

‘स्वरा भास्कर ने बहुत अच्छी बात कही’

साजिद रशीदी ने स्वरा के बयान के समर्थन में कहा कि सवाल यह होना चाहिए कि किसी दुष्कर्म पीड़िता को समाज किस तरह का संदेश दे रहा है। उनके मुताबिक, किसी महिला के जिंदा बच जाने को उसकी कमजोरी मानना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि कुछ लोग इतिहास के संदर्भ में यह तर्क देते हैं कि युद्ध में जीतने वाला राजा महिलाओं को पकड़कर अपने साथ ले जाता था। रशीदी ने इसी दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतिहास में उन्हें ऐसी कोई घटना नहीं मिलती, जिसमें किसी बादशाह ने किसी महिला को बंदी बनाया हो और उसके साथ अपराध किया हो। यह मौलाना रशीदी का ऐतिहासिक आकलन है, न कि यहां स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक निष्कर्ष के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।

अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती का भी किया जिक्र

मौलाना रशीदी ने अलाउद्दीन खिलजी और रतन सेन से जुड़े पद्मावती के प्रसंग का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि खिलजी रानी को पकड़ भी लेते तो उनके मुताबिक उन्हें रानी का दर्जा देकर अपने हरम में रखा जाता, न कि उनके साथ अपराध किया जाता।

रशीदी ने यह भी दावा किया कि मुस्लिम बादशाहों के हरम में हिंदू रानियां भी रही थीं। उनके अनुसार, इस पूरे विषय को धार्मिक आस्था से जोड़ना सही नहीं है। हालांकि, इतिहास से जुड़े ऐसे दावों को अलग-अलग ऐतिहासिक स्रोतों और शोध के संदर्भ में देखा जाना जरूरी है।

जौहर को लेकर क्या बोले साजिद रशीदी?

इस विवाद पर रशीदी ने जौहर को बहादुरी का प्रतीक मानने पर भी सवाल उठाया। उनके मुताबिक इतिहास में ऐसी कई महिलाएं रही हैं जिन्होंने दुश्मन का मुकाबला करते हुए अपने प्राण गंवाए। उनका मानना है कि युद्धभूमि में लड़ते हुए जान देना वीरता का उदाहरण है, जबकि जौहर को इसी अर्थ में बहादुरी कहना उचित नहीं है।

उन्होंने जौहर को किसी धार्मिक आदेश से जोड़ने से भी इनकार किया और कहा कि इसे धर्म के चश्मे से देखने के बजाय उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना चाहिए।

आखिर स्वरा भास्कर ने क्या कहा था?

पूरा विवाद 31 अगस्त को नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित ‘वुमन लाइफ फ्रीडम टॉक’ कार्यक्रम के दौरान स्वरा भास्कर की टिप्पणी से शुरू हुआ। उनसे वर्ष 2018 में फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर लिखे गए उनके खुले पत्र के बारे में सवाल पूछा गया था।

जवाब में स्वरा ने फिल्म में दिखाए गए जौहर के दृश्य पर अपनी आपत्ति जाहिर की थी। उन्होंने सवाल उठाया था कि यदि कोई महिला दुष्कर्म की पीड़िता बनने के बाद भी जीवित रहती है तो क्या फिल्म या समाज उसे यह संदेश देना चाहता है कि सम्मान बचाने के लिए उसे अपनी जान दे देनी चाहिए।

स्वरा की इसी टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई। कुछ लोगों ने उनके बयान को जौहर करने वाली महिलाओं के अपमान के तौर पर देखा, जबकि उनके समर्थकों का कहना रहा कि अभिनेत्री का सवाल उस सामाजिक सोच पर था जिसमें दुष्कर्म पीड़िताओं के सामने आत्महत्या को किसी तरह की ‘इज्जत’ से जोड़ दिया जाता है।

‘पद्मावत’ और इतिहास को लेकर फिर बहस

स्वरा भास्कर के बयान और मौलाना साजिद रशीदी की प्रतिक्रिया के बाद ‘पद्मावत’, जौहर और इतिहास में महिलाओं की स्थिति को लेकर बहस फिर सामने आ गई है। खास तौर पर यह सवाल उठ रहा है कि ऐतिहासिक घटनाओं को फिल्मों में किस तरह दिखाया जाना चाहिए और आधुनिक समाज उन घटनाओं की व्याख्या किस नजरिए से करे।

फिल्म ‘पद्मावत’ वर्ष 2018 में रिलीज हुई थी और इसके इर्द-गिर्द उस समय भी इतिहास, रानी पद्मावती के चरित्र तथा जौहर के चित्रण को लेकर व्यापक विवाद हुआ था। अब स्वरा भास्कर की पुरानी टिप्पणी के संदर्भ में हुई नई चर्चा ने इस मुद्दे को दोबारा सुर्खियों में ला दिया है।

विवाद में इतिहास बनाम आधुनिक नजरिया

इस पूरे विवाद की एक अहम परत इतिहास और आधुनिक सामाजिक मूल्यों के बीच का अंतर भी है। जौहर जैसी ऐतिहासिक प्रथा को लेकर अलग-अलग समुदायों और इतिहासकारों की व्याख्याएं अलग रही हैं। ऐसे में किसी एक बयान को अंतिम ऐतिहासिक सत्य मानने के बजाय संबंधित प्राथमिक और शोधपरक स्रोतों के आधार पर निष्कर्ष निकालना अधिक उचित है।

फिलहाल स्वरा भास्कर के बयान पर जारी बहस में मौलाना साजिद रशीदी का समर्थन एक नया एंगल लेकर आया है। रशीदी ने जहां स्वरा की बात को सही ठहराया, वहीं जौहर को बहादुरी से जोड़ने और मध्यकालीन इतिहास में महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर प्रचलित दावों पर भी अपनी अलग राय रखी है।

Check Also

Quiet Corners, Bright Reels: How a Casino Lobby Sets the Mood

An online casino’s lobby is more than a directory of games. It is the first …